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Yog Darshan

Yog Sutra - 19

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.19

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ।। 19 ।।

शब्दार्थ

:- भव ( संसार ) प्रत्यय ( यथार्थ ज्ञान / कारण ) विदेह ( शरीर रहित ) प्रकृतिलयानाम् ( मूल प्रकृति को जानने वाले नाम के योगी )

सूत्रार्थ

:-  संसार का यथार्थ ज्ञान  अर्थात सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, आकाश, सुख - दुःख का विवेकपूर्ण चिंतन  करने से जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती है । उसे भवप्रत्यय  नामक असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं । उस यथार्थ ज्ञान को प्राप्त होंने पर योगी अपनी देह  के अभिमान  से रहित होकर मूल प्रकृति  में लीन हो जाता है । समाधि की ऐसी अवस्था को प्राप्त योगियों को क्रमशः विदेह योगी  व प्रकृतिलय योगी  कहते हैं ।

व्याख्या

:- इस सूत्र में विदेह  और प्रकृतिलय  योगियों की भवप्रत्यय  नामक असम्प्रज्ञात समाधि  का वर्णन किया गया है ।

भवका अर्थ है संसार । इस संसार में ग्रह, नक्षत्र, प्राणी, विषय भोग की वस्तुएँ, सभी प्रकार के सुख- दुःख आदि का यथार्थ  ( सही- सही ) ज्ञान होने को  भवप्रत्यय समाधि  कहते हैं ।

विदेह योगी :-  विदेह योगी वह होते है जिन्होंने यथार्थ ज्ञान  से अपने शरीर, इन्द्रियों, व अन्य स्थूल तत्वों का विशेष रूप से साक्षात्कार  करके अपने शरीर, इन्द्रियों व स्थूलभूतों का कर्ता ईश्वर  को मान लेता है । इस प्रकार वह अपनी देह  के अभिमान  ( अहंभाव ) से रहित हो चुके होते हैं । ऐसे योगियों को विदेह योगी  कहा जाता है ।

विदेह योगी का अर्थ यह नही है कि जिनकी देह  ( शरीर ) ही नही होता । क्योंकि समाधि  की प्राप्ति कभी भी बिना देह अर्थात शरीर के नही हो सकती । इसलिए विदेह का अर्थ मात्र इतना ही है कि योगी स्वम को कर्तापन  से रहित समझने लगता है । अर्थात देह के अभिमान  से मुक्त हो जाता है ।

उदहारण स्वरूप :-  आज हम समाज में अनेक प्रकार के लोगों को देखते हैं जो कि दूसरों की सेवा  करने में हमेशा तत्पर रहते हैं । यें मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं - पहले वो होते हैं जो किसी की सहायता तो कर देंगे पर उसका श्रेय  लेने के साथ- साथ जिसकी सहायता की है उसके ऊपर अहसान  भी दिखाएंगे । ऐसे लोग अपने आप को ही उस कार्य का कर्ता  मानकर समाज में प्रतिष्ठा  (  मान- सम्मान ) प्राप्त करने का प्रयास करते रहते हैं । ऐसे लोग समाज में ज्यादा पाए जाते हैं ।

दूसरे प्रकार के लोग वें होते हैं जो किसी की भी  सहायता बिना किसी स्वार्थ  या प्रतिष्ठा  प्राप्ति के करते हैं । और स्वंम को उस कार्य का कर्ता  न मानकर ईश्वर  को उसका कर्ता  मानते हैं । न ही तो यें व्यक्ति किसी तरह का श्रेय  लेते हैं । और न ही इनको किसी प्रकार के मान- सम्मान  की लालसा होती है ।

यह कर्तापन  के अहंभाव  से मुक्त होते हैं । आप सभी ने समाज में ऐसे भी बहुत से लोगों को देखा होगा ।

यें जो दूसरे प्रकार के लोगों की स्थिति होती है ठीक ऐसे ही विदेह योगियों  की स्थिति होती है । वह भी इस देह और उससे होने वाले कार्यों का कर्ता ईश्वर  को मानकर उसकी ही उपासना में अपने आप को समाधिस्थ  करने का प्रयास करते हैं । किसी भी तरह का देह  का अभिमान  उनको नही होता है । ऐसे योगियों को ही विदेह योगी  कहा गया है ।

प्रकृतिलय योगी :- जो योगी साधक मूल प्रकृति  ( 25 तत्वों ) को भली- भाँति जानकर उसका साक्षात्कार  कर लेते हैं । तब वह साधक अपने आप को प्रकृति में लीन  कर देते हैं । इस प्रकार से प्रकृतिलय  करने वाले साधक प्रकृतिलय योगी  कहलाते हैं ।

इस भवप्रत्यय  नामक समाधि  में योगी कैवल्य  ( परमानन्दस्वरूप ) जैसा अनुभव करता है । जब तक कि उसकी यह समाधि भंग नही हो जाती । कैवल्य अवस्था  में ही परम सुख की अनुभूति होती है । इसके अतिरिक्त जो सुख है वह स्थायी नही है  क्योंकि उसमे दुःख  का मिश्रण  ( मिलावट ) होता है ।

भवप्रत्यय समाधि के कारण :-

इस भवप्रत्यय समाधि  का मुख्य कारण पूर्व जन्म  की योग साधना होती है । जो योगी साधना के अन्तिम चरण  में थे लेकिन किसी कारण से उनका शरीर छूट  ( मृत्यु हो ) गया । साथ ही मोक्षशास्त्रों  के अध्ययन व सत्संग  का (  पूर्व जन्म का ) प्रभाव भी इस समाधि  की प्राप्ति में सहयोगी होते हैं ।

लेकिन इसका अर्थ यह बिलकुल भी नही है कि इस जन्म में उनको किसी प्रकार का प्रयास  या पुरुषार्थ  नही करना पड़ता । यह केवल कारण मात्र है । उसको पुनः प्राप्त करने के लिए फिर से योग साधना  का अनुसरण  योगी को करना ही पड़ता है । तभी उसकी पूर्व जन्म की साधना फलीभूत  होती है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. nisha

    Comment…thanku so much sir??

  2. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji. Bhut sunder.. aapka

    Bhut bhut dhanyavad. . Koti vandan Sriman Smmaniya Aacharya ji. ?.????

  3. Mamta

    Thank you sir

  4. Alok Kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव*

    बहुत सुन्दर व्याख्या की है आपने।पढ़कर हृदय अति आनंदित हुआ। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप ऐसे ही हम जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करते रहें।

    आपको शत _शत नमन ।

  5. aashish

    For giving Bhavpartte samadi knowledge guru ji thanks.

  6. parkash saini

    guru ji -nice

  7. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Very well explained.

  8. Jayashree

    Very nicely explained, appropriate, words.