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Yog Darshan

Yog Sutra - 11

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.11

अनुभूतविषयासम्प्रमोष : स्मृति : ।। 11 ।।

शब्दार्थ

:- अनुभूत, ( पहले से अनुभव या महसूस किए गए ) विषय, ( घटनाक्रम का  ) असम्प्रमोष: , ( दोबारा से स्मरण या याद आना ) स्मृति  ( स्मरण शक्ति या याददाश्त ) है।

सूत्रार्थ

:- पहले से अनुभव की गई घटनाओं का दोबारा से याद  आ जाना ही स्मृति नामक वृत्ति होती है ।

व्याख्या

:- हमारे जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी घटती हैं, जो जीवन पर्यन्त  हमें याद  रहती हैं । जब भी उन घटनाओं से सम्बंधित कोई अन्य घटना घटती है । तब हमें पहले से घटित वो घटना ( बात ) याद आ जाती है । जो पहले इसी प्रकार से घटी हो । इस प्रकार के पुनः स्मरण  को ही स्मृति वृत्ति  कहा है ।

हमारे चित्त में भिन्न - भिन्न प्रकार की घटनाओं के संस्कार संचित  होते हैं । जब किसी भी संस्कार से सम्बंधित कोई घटना हमारे सामने घटती है । तो उससे सम्बन्धी जो संस्कार चित्त  में होता है । वह पुनः जाग्रत  हो जाता है । इस प्रकार के पुनः स्मरण  को ही स्मृति  कहा है ।

उदाहरण स्वरूप :-

जैसे कोई व्यक्ति आपको अपने कॉलेज  या यूनिवर्सिटी  ( महाविद्यालय या विश्वविद्यालय )के समय की कोई घटना बताए । और उसकी इस बात से आपको अपने कॉलेजया यूनिवर्सिटी  की वैसी ही कोई घटना याद आ जाए । या कोई अपने विदेश दौरे  को लेकर अपना अनुभव आपको बताता है । तब उसके उस अनुभव से आपको अपने विदेश दौरेका अनुभव याद आ जाए । इसे स्मृति कहते हैं । इस प्रकार पहले से घटी हुई घटनाओं की पुनरावृत्ति  होना ही स्मृति वृत्ति  कहलाती है ।

स्मृति वृत्ति का क्लिष्ट स्वरूप :-

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा ही सही लेकिन कभी न कभी बीमार  अवश्य ही हुआ होगा । जब हमारा कोई परिचित बीमार  हो जाता है । तब हम उसका कुशलक्षेम  ( हालचाल ) पूछने जाते हैं । अचानक उस समय हमें पूर्व में अपने बीमार होने की कोई घटना याद  आती है । और उसे याद करके हमें पुनः कष्ट  का अनुभव होता है ।  यह स्मृति वृत्ति  का क्लिष्ट  स्वरूप है ।

स्मृति वृत्ति का अक्लिष्ट स्वरूप :-

जब हम किसी सम्मान  समारोह में जाते हैं । और किसी को सम्मानित होते हुए देखते हैं । तब हमें पूर्व में किसी समारोह में अपना सम्मानित  होना याद  आता है । और उसे याद करके हमें एक सुखद अनुभूति होती है । इस प्रकार की सुखद अनुभूति  का स्मरण  होना स्मृति वृत्ति  का अक्लिष्ट  स्वरूप है ।

अगले सूत्र में इन सभी वृत्तियों  के निरोध  का उपाय बताया गया है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. nisha

    Comment…sir, you are very valuable gift for us because you are making such a great knowledge available to us so easily ??thanku sir

  2. Anshu

    प्रणाम आचार्य जी, धन्यवाद! ?शब्द ज्ञान की इतनी सुन्दर व्याख्या को पढ़ने से बार-बार एक प्रसन्नता भरी अनुभूति होती है । सत्य है कि ईश्वर प्रसन्न होगें जो हमे इतनी सुंदर व्याख्या आपके द्वारा प्रदान की जा रही है । आपको बारम्बार प्रणाम आचार्य जी ।

  3. Mamta Sangwan

    Thanks again sir

  4. Krishan

    मेरा प्रणाम स्वीकारे हम सब बहुत ही सोभाग्य शाली हैं जो हमें इतना सुन्दर सच्चा सही मार्गदर्शन मिला है

    मेरा बारमबार प्रणाम

  5. Alok Kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव*

    आपके द्वारा किए गए योगसूत्रों की इतनी सुन्दर व्याख्या के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अति सुन्दर, स्पष्ट व प्रभावशाली व्याख्या।

    आपका बहुत_ बहुत आभार ।

  6. aashish

    Large explanation guru ji