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Yog Darshan

Yog Sutra 3 - 15

अध्याय 3: विभूतिपाद

मूल सूत्र · 3.15

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतु: ।। 15 ।।

शब्दार्थ

क्रम ( क्रम ) अन्यत्वम् ( भिन्नता या अन्तर ) परिणाम ( फल या नतीजा ) अन्यत्वे ( भिन्नता या अन्तर ) हेतु ( कारण या वजह )

सूत्रार्थ

क्रम की भिन्नता के कारण ही धर्मी के अलग- अलग परिणाम होते हैं ।

व्याख्या

इस सूत्र में क्रम की भिन्नता को परिणाम की भिन्नता का कारण बताया गया है ।

यहाँ धर्मी के परिणाम की बात कही गई है । सामान्य रूप से एक धर्मी अर्थात किसी वस्तु का जो आधार होता है उनका एक ही परिणाम होना चाहिए । परन्तु जब उस धर्मी का क्रम अर्थात अवस्था बदलती है तब उसका परिणाम भी साथ ही बदल जाता है ।

इस प्रकार क्रम के बदलने से धर्मी का परिणाम ( अवस्था ) भी बदल जाता है ।

जैसे- मिट्टी धर्मी है अर्थात मिट्टी का आधार ठोस है । लेकिन जैसे ही उस मिट्टी को हम पीसकर बारीक बना देते हैं , तब उसका क्रम ठोस से बारीक में बदल जाता है । उसके बाद उस मिट्टी के चूर्ण में यदि पानी मिला दिया जाए तो वह एक पिण्ड का आकार ले लेती है । उस मिट्टी के पिण्ड को जब कुम्हार चाक पर गोल- गोल घुमाकर उसे एक घड़े का रूप दे देता है । इस प्रकार वह मिट्टी का ठोस अंश पहले बारीक हुआ, फिर वह पानी के मिश्रण से एक पिण्ड बना । उसके बाद कुम्हार ने चाक की सहायता से उसे घड़े का रूप दे दिया । इस प्रकार एक मिट्टी का कुछ भाग अलग- अलग क्रम से होता हुआ घड़ा जा बना । जैसे ही मिट्टी का क्रम बदला वैसे ही उसका परिणाम भी उसके साथ- साथ बदलता रहा । इस क्रम के बदलने से ही मिट्टी का एक भाग घड़ा बन जाता है । उसके बाद भी वह क्रम निरन्तर बदलता ही रहता है । और एक दिन जब वह घड़ा गलकर पुनः मिट्टी का रूप धारण कर लेता है । तो पुनः क्रम के बदलने से उसका परिणाम भी बदल गया ।

ठीक इसी प्रकार हमारा शरीर भी अलग- अलग क्रम से होता हुआ अलग- अलग परिणाम अर्थात अवस्था को प्राप्त होता है । जन्म के समय बच्चा बहुत छोटा होता है । उस समय उसे नवजात कहा जाता है । जैसे ही वह स्कूल जाने लगता है वह उसका बाल्यकाल कहलाता है । स्कूल की पढ़ाई पूरी होने पर वह कॉलेज जाता है तब वह युवा कहलाता है । जैसे ही उसकी नौकरी लगती है वैसे ही उसकी शादी हो जाती है । ( हमारे देश में  शादी होने के लिए ज्यादातर नौकरी का होना अनिवार्य माना जाता है ) शादी के बाद वह एक पुरुष की श्रेणी में आ जाता है । और धीरे - धीरे जब उसके बच्चे बड़े होन लगते हैं तो वह उम्रदराज कहलाने लगता है । फिर बुढ़ापा और उसके बाद मुक्ति । इस प्रकार एक नवजात ( शिशु ) अलग- अलग क्रम से होता हुआ अलग- अलग परिणाम ( अवस्था ) वाला बन जाता है । जैसे जैसे उसका क्रम बदलता है वैसे वैसे उसका परिणाम बदलता रहता है ।

अतः इस सूत्र में क्रम को ही परिणाम के बदलने का कारण माना गया है ।

https://youtu.be/1WQkSzyuVXg

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ?PRNAM AACHARYA JI!thank you for this Vivid explanation ?

  2. Nisha bhardwaj

    Thanku sir??

  3. Manisha dahiya

    Thanks guru ji

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ??very easy to understand by your to the point examples.

  5. Anju siwach

    Thank you sir

  6. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपको हृदय से शत शत नमन एवं चरण वंदन।

  7. aashish malhan

    Nice explain guru ji how karma effect on result.