जातिलक्षणदेशैरन्यताऽवच्छेदात्तुल्योस्तत: प्रतिपत्ति: ।। 53 ।।

 

शब्दार्थ :- जाति ( कोई विशेष समूह ) लक्षण ( किसी व्यक्ति या समूह द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप ) देशै: ( स्थान या जगह का ) अन्यताऽनवच्छेदात् ( जिसमें भेद अर्थात अन्तर न किया जा सके ऐसी ) तुल्ययो: ( एक जैसी या एक समान दिखने वाली वस्तुओं का ) तत: ( उससे अर्थात उस विवेक ज्ञान से ) प्रतिपत्ति: ( अलग- अलग पता चल जाता है )

 

 

सूत्रार्थ :- जाति, लक्षणों व स्थान से एक ही जैसी दिखने वाली वस्तुओं में अन्तर ( फर्क ) न पता चलने की स्थिति में उस विवेक ज्ञान के द्वारा योगी को उन दो अलग- अलग वस्तुओं के बीच के अन्तर ( फर्क ) का पता चल जाता है ।

 

 

व्याख्या :-  इस सूत्र में विवेक ज्ञान से मिलने वाले लाभ का वर्णन किया गया है ।

 

योगी द्वारा क्षण के क्रम में संयम करने से विवेक से जनित ज्ञान की प्राप्ति होती है । जिससे वह सत्य व असत्य के बीच का भेद आसानी से कर लेता है । इस संसार में जितने भी पदार्थ विद्यमान हैं । उन सभी को अलग- अलग जानने व पहचानने के तीन आधार होते हैं । जिनका वर्णन इस प्रकार है :-

 

  1. जाति
  2. लक्षण
  3. देश ।

 

  1. जाति के आधार पर :- किसी भी पदार्थ का भेद उसकी जाति के द्वारा भी निर्धारित किया जाता है । जैसे- गाय व घोड़ी । यह दोनों ही दिखने में एक जैसी होती हैं परन्तु इनमें बहुत सारा अन्तर होता है । ऊपरी बनावट से इनमें अन्तर करना कठिन होता है ।
  2. लक्षण के आधार पर :- जब एक ही जाति की बहुत सारी गाय या घोड़ी एक साथ खड़ी हो तो उनमें रंग या किसी विशेष चिन्ह अर्थात निशानी के द्वारा उनमें अन्तर किया जाता है । जैसे- सफेद गाय, काली गाय या रंग बिरंगी गाय । यहाँ पर उनको अलग- अलग जानने का माध्यम उनका अलग- अलग दिखना है । जिसे लक्षण कहते हैं ।
  3. देश के आधार पर :- यह तीसरा आधार है जिससे हमें दो पदार्थों के बीच के अन्तर का पता चलता है । देश का अर्थ है स्थान या जगह । जैसे- भारत में गाय की देशी नस्ल पाई जाती है । और यूरोप में गाय की जर्सी नस्ल पाई जाती है । इससे भी हमें पता चलता है कि कौन सी गाय किस देश अर्थात स्थान की है ।

 

लेकिन जब जाति, लक्षण व देश के द्वारा भी पदार्थों के बीच का अन्तर न पता चल पाए । तो विवेक से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा उसका पता लगाया जा सकता है । हो सकता है किसी ने गाय और घोड़ी के बीच अन्तर का न पता हो, उनके अलग- अलग लक्षणों का न पता हो और हो सकता है कि उसने अलग- अलग देशों की यात्रा न की हो । जिससे उसको उनके बीच के फर्क का पता नहीं चल रहा है । इस स्थिति में वह योगी जिसने क्षण के क्रम में संयम किया हुआ है । वह अपने विवेक से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा उन सभी के बीच के अन्तर को आसानी से पता लगा लेता है ।

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