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Yog Darshan

Yog Sutra 3 - 53

अध्याय 3: विभूतिपाद

मूल सूत्र · 3.53

जातिलक्षणदेशैरन्यताऽवच्छेदात्तुल्योस्तत: प्रतिपत्ति: ।। 53 ।।

शब्दार्थ

जाति ( कोई विशेष समूह ) लक्षण ( किसी व्यक्ति या समूह द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप ) देशै: ( स्थान या जगह का ) अन्यताऽनवच्छेदात् ( जिसमें भेद अर्थात अन्तर न किया जा सके ऐसी ) तुल्ययो: ( एक जैसी या एक समान दिखने वाली वस्तुओं का ) तत: ( उससे अर्थात उस विवेक ज्ञान से ) प्रतिपत्ति: ( अलग- अलग पता चल जाता है )

सूत्रार्थ

जाति, लक्षणों व स्थान से एक ही जैसी दिखने वाली वस्तुओं में अन्तर ( फर्क ) न पता चलने की स्थिति में उस विवेक ज्ञान के द्वारा योगी को उन दो अलग- अलग वस्तुओं के बीच के अन्तर ( फर्क ) का पता चल जाता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में विवेक ज्ञान से मिलने वाले लाभ का वर्णन किया गया है ।

योगी द्वारा क्षण के क्रम में संयम करने से विवेक से जनित ज्ञान की प्राप्ति होती है । जिससे वह सत्य व असत्य के बीच का भेद आसानी से कर लेता है । इस संसार में जितने भी पदार्थ विद्यमान हैं । उन सभी को अलग- अलग जानने व पहचानने के तीन आधार होते हैं । जिनका वर्णन इस प्रकार है :-

  1. जाति
  2. लक्षण
  3. देश ।
  1. जाति के आधार पर :- किसी भी पदार्थ का भेद उसकी जाति के द्वारा भी निर्धारित किया जाता है । जैसे- गाय व घोड़ी । यह दोनों ही दिखने में एक जैसी होती हैं परन्तु इनमें बहुत सारा अन्तर होता है । ऊपरी बनावट से इनमें अन्तर करना कठिन होता है ।
  2. लक्षण के आधार पर :- जब एक ही जाति की बहुत सारी गाय या घोड़ी एक साथ खड़ी हो तो उनमें रंग या किसी विशेष चिन्ह अर्थात निशानी के द्वारा उनमें अन्तर किया जाता है । जैसे- सफेद गाय, काली गाय या रंग बिरंगी गाय । यहाँ पर उनको अलग- अलग जानने का माध्यम उनका अलग- अलग दिखना है । जिसे लक्षण कहते हैं ।
  3. देश के आधार पर :- यह तीसरा आधार है जिससे हमें दो पदार्थों के बीच के अन्तर का पता चलता है । देश का अर्थ है स्थान या जगह । जैसे- भारत में गाय की देशी नस्ल पाई जाती है । और यूरोप में गाय की जर्सी नस्ल पाई जाती है । इससे भी हमें पता चलता है कि कौन सी गाय किस देश अर्थात स्थान की है ।

लेकिन जब जाति, लक्षण व देश के द्वारा भी पदार्थों के बीच का अन्तर न पता चल पाए । तो विवेक से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा उसका पता लगाया जा सकता है । हो सकता है किसी ने गाय और घोड़ी के बीच अन्तर का न पता हो, उनके अलग- अलग लक्षणों का न पता हो और हो सकता है कि उसने अलग- अलग देशों की यात्रा न की हो । जिससे उसको उनके बीच के फर्क का पता नहीं चल रहा है । इस स्थिति में वह योगी जिसने क्षण के क्रम में संयम किया हुआ है । वह अपने विवेक से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा उन सभी के बीच के अन्तर को आसानी से पता लगा लेता है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. aashish malhan

    Guru ji nice explain vivakgayana benefit.

  2. Lata sudhir baisane

    Dhanyawad.

  3. Nisha bhardwaj

    Thanku sir??