तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ।। 10 ।।

 

शब्दार्थ :- संस्करात् ( संस्कारों के प्रभाव से ) तस्य ( उसकी अर्थात चित्त की ) वाहिता ( स्थिति या अवस्था ) प्रशान्त ( बिलकुल शान्त होती है । )

 

सूत्रार्थ :- संस्कारो के प्रभाव से चित्त की स्थिति बिलकुल शान्त हो जाती है । अर्थात उस अवस्था में हमार चित्त शान्त गति के प्रवाह में प्रवाहित होता रहता है ।

 

व्याख्या :- इस सूत्र में चित्त की निरोध अवस्था का वर्णन किया गया है ।

 

जब हमारा चित्त व्युत्थान संस्कारों से युक्त होता है तो उस समय चित्त की दशा पूरी तरह से अस्थिर होती है । और जैसे ही चित्त निरोध संस्कारों से युक्त होता है तो उस समय चित्त की दशा अथवा स्थिति बिलकुल स्थिर एवं शान्त होती है ।

 

व्युत्थान काल में चित्त में रजोगुण का प्रभाव बढ़ जाता है । जिससे चित्त अस्थिरता वाला हो जाता है । और निरोध काल में चित्त में सत्त्वगुण का प्रभाव बढ़ने से वह बिलकुल शान्त व स्थिर अवस्था वाला हो जाता है । जिस प्रकार हवा के रुकने से तालाब का पानी एकदम शान्त हो जाता है । उसमें किसी तरह की कोई हलचल नहीं होती है ।

 

इसको हम अन्य उदाहरण के माध्यम से भी समझ सकते हैं –  जब भी हम किसी खुली जगह पर अग्नि जलाते हैं तो वह अग्नि कभी तेज हो जाती है तो कभी मन्द । कभी उसमें से धुआँ भी निकलने लगता है । अग्नि की यह जो अवस्था है वही अवस्था व्युत्थान काल में चित्त की होती है ।

 

और जब वह अग्नि पूरी तरह से बुझ चुकी होती है । उस समय न ही तो उसमें किसी प्रकार की तपिश ( गर्मी ) होती है और न ही किसी प्रकार का धुआँ । अग्नि के बुझने के बाद कि यह जो अवस्था होती है ठीक वैसी ही अवस्था चित्त की निरोध काल में होती है ।

 

इस प्रकार निरोध संस्कारों के अच्छे अभ्यास से ही चित्त की स्थिति एकदम शान्त होती है । जैसे ही निरोध संस्कार का प्रभाव कम होता है वैसे ही व्युत्थान संस्कारों का प्रभाव बढ़ जाता है । अर्थात एक समय पर चित्त की एक ही अवस्था हो सकती है । जब चित्त व्युत्थान अवस्था में होगा तो निरोध अवस्था दब जाएगी और यदि निरोध अवस्था प्रबल होगी तो व्युत्थान अवस्था कमजोर हो जाएगी ।

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  1. ?Prnam Aacharya ji! This knowledge is beautiful because with these lessons you really make our souls pure and peaceful. . And restrain us from the wrong way. . You are like a real Guru of the Era and an angel of God. .हे रामरतेय Prnam again and again. .Om ?

  2. पूर्णतः सहमत श्रीमान जी, बहुत ही उमदा उदाहरण दिए हैं।

  3. ॐ गुरुदेव*
    निरोध अवस्था का अति सुन्दर
    व्याख्या प्रस्तुत की है आपने।
    इसके लिए आपको बहुत बहुत आभार।

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