परिणामत्रयसंयमादतीतानागत ज्ञानम् ।। 16 ।।

शब्दार्थ :- परिणामत्रय ( धर्म, लक्षण व अवस्था परिणाम में ) संयमात् ( संयम करने से ) अतीत ( भूतकाल ) अनागत ( भविष्य काल का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )

सूत्रार्थ :- परिणाम वाले पदार्थों के धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम व अवस्था परिणामों में संयम करने से उन सभी पदार्थों के भूतकाल और भविष्यकाल का भली -भाँति ( अच्छी प्रकार से ) ज्ञान हो जाता है ।

व्याख्या :- इस सूत्र में धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम व अवस्था परिणाम में संयम करने पर मिलने वाले फल के विषय में बताया गया है । विभूतिपाद के इसी सूत्र से साधक को संयम के प्रयोग से प्राप्त होने वाली विभूतियों या सिद्धियों का क्रम शुरू होता है ।

इन तीनों परिणामों का वर्णन इसी पाद के तेहरवें (13) सूत्र में किया जा चुका है । यह तीनों परिणाम पंच भूतों व इन्द्रियों में होने वाले परिणाम है ।

अब हम संयम का वर्णन करते हैं । आगे के सूत्रों में संयम शब्द का बार- बार प्रयोग किया जाएगा । अतः एक बार संयम को अच्छी तरह से समझ लेते हैं ।

संयम :- विभूतिपाद के चौथे (4) सूत्र में संयम को परिभाषित करते हुए कहा है कि धारणा, ध्यान व समाधि इन तीनों का एक ही विषय में एक साथ प्रयोग करना संयम कहलाता है । अर्थात किसी एक वस्तु या पदार्थ का साक्षात्कार करने के लिए एक ही समय में एक साथ धारणा, ध्यान व समाधि का उपयोग किया जाता है, तब वह संयम कहलाता है ।

अब यहाँ पर धारणा, ध्यान व समाधि का प्रयोग पदार्थ के तीनों परिणामों में करने की बात कही गई है । इस प्रकार जब साधक पदार्थ के तीनों परिणामों ( धर्म, लक्षण व अवस्था ) में संयम करता है तो उसे उन सभी पदार्थों के अतीत अर्थात भूतकाल व अनागत अर्थात भविष्यकाल के बारे में पूर्ण ज्ञान हो जाता है । अर्थात परिणामों में संयम करने से साधक को उनके भूतकाल व भविष्यकाल के सही स्वरूप की जानकारी हो जाती है ।

पदार्थ के भूतकाल का ज्ञान :- भूतकाल का अर्थ है कि किसी भी पदार्थ या वस्तु के बारे में यह जानकारी होना कि यह वस्तु या पदार्थ कब अस्तित्व में आया है । जब कोई साधक किसी पेड़ के धर्म, लक्षण व अवस्था परिणामों में संयम करता है तो उसे आसानी से यह पता चल जाता है कि यह पेड़ कितना पुराना है । यह कब अस्तित्व में आया है ।

पदार्थ के भविष्य का ज्ञान :- भविष्यकाल का अर्थ है कि किसी भी पदार्थ या वस्तु के आने वाले समय के  बारे में जानकारी होना कि यह वस्तु या पदार्थ कब तक विद्यमान रहेगा । अर्थात यह पदार्थ कब नष्ट होगा । जब कोई साधक किसी पेड़ के धर्म, लक्षण व अवस्था परिणामों में संयम करता है तो उसे आसानी से यह पता चल जाता है कि यह पेड़ कब तक रहेगा । अर्थात उसे यह पता चल जाता है कि इस पेड़ की आयु कितनी होगी । यह कब नष्ट होगा । यह उस पेड़ का भविष्यकाल है ।

एक सामान्य मनुष्य को इस प्रकार की कोई जानकारी या ज्ञान नहीं होता है कि किसी पदार्थ का अतीत व भविष्य क्या है । परंतु योगी साधक संयम का पालन करके यह पता लगा लेता है ।

अतः जब साधक पदार्थ के तीनों परिणामों में संयम करता है तो उसे उस पदार्थ के भूतकाल व भविष्यकाल के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त हो जाती है ।

यह परिणामों में किए गए संयम का फल है ।

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  1. ॐ गुरुदेव*
    अति सुंदर व्याख्या
    आपको हृदय से परम आभार।

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