शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतरा ध्यासात्संकरस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ।। 17 ।।

 

शब्दार्थ :- शब्द ( शब्द या अक्षर ) अर्थ ( उसका अभिप्राय या मतलब ) प्रत्ययानाम् ( ज्ञान या जानकारी को ) इतरेतर ( आपस में ) अध्यासात् ( अध्यास अर्थात जुड़े होने से ) संकर: ( उनका एक दूसरे के साथ मिश्रण अर्थात वो एक दूसरे के साथ मिल जाते हैं ) तत् ( तब उनके अर्थात शब्द, अर्थ व ज्ञान के ) प्रविभाग ( अलग- अलग भागों में ) संयमात् ( संयम करने से ) सर्व ( सभी ) भूत ( प्राणियों या जीवधारियों के ) रुत ( शब्दों या वाक्यों का ) ज्ञानम् ( ज्ञान अर्थात जानकारी हो जाती है )

 

सूत्रार्थ :- किसी भी वाक्य के शब्द, अर्थ व उसके ज्ञान के आपस में जुड़े होने के कारण उनका एक दूसरे के साथ जुड़ाव होता है । इस प्रकार उनके सभी अलग- अलग भागों अर्थात शब्द, अर्थ व ज्ञान में संयम करने से योगी को सभी प्राणियों के सभी शब्दों का ज्ञान हो जाता है ।

 

व्याख्या :- इस सूत्र में कहा गया है कि योगी द्वारा शब्द, अर्थ व ज्ञान में संयम करने पर उसे सभी प्राणियों के शब्दों का ज्ञान हो जाता है ।

जब हम सभी किसी वस्तु या पदार्थ के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, तो सबसे पहले हम उसका नाम लेते हैं । उस नाम से हमारे मस्तिष्क में उसकी तस्वीर या छवि बनती है । उससे हमें उस शब्द का अर्थ अर्थात उसका मतलब पता चलता है । और वह अर्थ ही हमें उसकी जानकारी करवाता है जिसे ज्ञान कहा जाता है ।

जैसे उदाहरण स्वरूप जब हमें कोई कहता है कि आम का पेड़ तो हम आम शब्द से आम के पेड़ का ध्यान कर लेते हैं । आम शब्द से ही हम आम, उसकी आकृति, उसका पेड़ व उसकी स्थिति अर्थात वह कहा पर पाया जाता है आदि- आदि । इन सभी का अनुमान लगा लेते हैं ।

इसी प्रकार जब योगी किसी भी शब्द, उसके होने वाले अर्थ व उसकी सभी स्थितियों में अलग- अलग संयम करता है, तो उसे उस शब्द का अच्छी तरह से ज्ञान हो जाता है । इसलिए योगी द्वारा शब्द, अर्थ व उसके ज्ञान में अलग- अलग संयम करने से केवल मनुष्यों का ही नहीं बल्कि सभी प्राणियों के सभी शब्दों का ज्ञान हो जाता है ।

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  1. ??प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर सूत्र! उत्तम वण॔न! सव॔व्याप्त आध्यात्म ! ओम! ????

  2. ॐ गुरुदेव*
    योग के इस परम गोपनीय
    ज्ञान का प्रकाश प्रसारित करने
    हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

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