कायाकाशयो: सम्बन्ध संयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ।। 18 ।।

 

शब्दार्थ :- काय ( शरीर व ) आकाशयो: ( आकाश के ) सम्बन्ध ( आपसी सम्बन्ध में ) संयमात् ( संयम करने से ) ( और ) लघु ( छोटे अथवा हल्के ) तूल ( रुई आदि पदार्थों या वस्तुओं में संयम करने से ) समापत्ते: ( उन्ही पदार्थों की भाँति हो जाता है) आकाश ( जिससे उसे आकाश में ) गमनम् ( घूमने की शक्ति प्राप्त होती है)

 

 

सूत्रार्थ :- शरीर व आकाश के आपसी सम्बन्ध में संयम करने और रुई जैसे बहुत ही हल्के पदार्थों में संयम करने से योगी उन्ही पदार्थों की तरह हल्का हो जाता है । इससे उसको आकाश में घूमने की शक्ति अथवा सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

 

व्याख्या :- इस सूत्र में आकाश में घूमने की सिद्धि के विषय में बताया गया है।

 

यहाँ पर दो जगह पर संयम करने की बात कही गई है। एक शरीर व आकाश के बीच व दूसरा रुई ( कपास का अत्यधिक बारीक व हल्का भाग या रूप ) जैसे बहुत ही हल्के पदार्थों में ।

 

स्वयं के शरीर व आकाश के सम्बंध में संयम करने और रुई जैसे बहुत ही हल्के पदार्थों में संयम करने से योगी का शरीर भी उन्ही हल्के पदार्थों की तरह हल्का हो जाता है । इससे उसको आकाश में उड़ने अथवा घूमने जैसी सिद्धि प्राप्त होती है।

 

शरीर व आकाश का आपस में गहरा सम्बन्ध है । जहाँ पर शरीर होगा वहीं पर आकाश होगा । आकाश का अर्थ होता है खालीपन अर्थात खाली जगह ।

 

जब योगी आकाश व शरीर के आपसी सम्बन्ध में संयम करता है तो वह उस सम्बन्ध पर विजय प्राप्त कर लेता है । जिससे वह रुई जैसे अत्यधिक हल्के पदार्थों में समापत्ति अर्थात उन्ही के जैसा अपने आप को बना लेता है । जिससे वह स्वयं भी अत्यधिक हल्का हो जाता है।

 

इस सृष्टि में बहुत सारे सिद्धान्त अपना- अपना कार्य बिना किसी रुकावट के करते हैं । जिनमें से एक सिद्धान्त गुरुत्वाकर्षण बल का भी होता है । गुरुत्वाकर्षण बल के सिद्धान्त का अर्थ होता है जो भी वस्तु हवा के भार से ज्यादा भारी होगी वह नीचे जमीन पर ही रहेगी । या किसी भी भारी वस्तु को हम यदि ऊपर से छोड़ेंगे तो वह नीचे की ओर ही आएगी । लेकिन यदि हम गुब्बारे में हवा भरके ऊपर से या नीचे से कही से भी छोड़ते हैं । तो वह ऊपर की ओर ही जाएगा । यही गुरुत्वाकर्षण बल का सिद्धान्त है । इस सिद्धान्त के विपरीत वायुयान या हवाई जहाज ( ऐरोप्लेन ) हवा पर विपरीत दबाव बनाकर ऊपर आकाश में यात्रा करते हैं । यह हवा के विपरीत दबाव का दूसरा सिद्धान्त है।

 

अब हम चर्चा करते हैं कि कैसे एक योगी आकाश में घूमने के इस कार्य को पूर्ण कर सकता है ? इसको समझने के लिए सबसे पहले हमें इस बात को समझना होगा कि आकाश का अर्थ हजारों फीट की ऊंचाई ही नहीं होता । बल्कि हर वह स्थान आकाश कहलाता है जो पृथ्वी से ऊपर होता है । पृथ्वी की सतह से आधा इंच ऊपर भी आकाश होता है । और हजारों फीट ऊपर भी आकाश ही होता है । अर्थात हर वह जगह जहाँ पर खाली स्थान है, जहाँ पृथ्वी या जल नहीं होता वह आकाश होता है।

 

आप सभी ने ऐसे अनेक सिद्ध योगियों के बारे में सुना होगा, जो समाधि की अवस्था में बैठें- बैठें ही ऊपर हवा में उठ जाते थे । वह अपनी साधना काल में अपने आप को इतना हल्का बना देते थे कि गुरुत्वाकर्षण बल का सिद्धान्त भी अपना काम नहीं कर पाता था । क्योंकि उनका शरीर उस बल के अधीन ही नहीं रहता था । जिस प्रकार गुब्बारा भी उस बल के अधीन नहीं होता । इसीलिए वह हवा में उड़ता रहता है।

 

यहाँ पर मेरा यह कहना नहीं है कि योगी भी हवाई जहाज की तरह ही हवा में घूमते रहते हैं या थे । बल्कि मेरे कहने का भाव यह है कि यदि कोई योगी योग साधना के बल पर अपने आप को अत्यधिक हल्का करके अपने आप को जमीन से थोड़ा बहुत भी ऊपर उठा देता है । तो वह आकाश गमन ही कहलाएगा । उसमें यह कोई मायने नहीं रखता कि आप कितने ऊपर उठे हो । क्योंकि आकाश तो आकाश होता है । चाहे आधा इंच हो या हजारों फीट।

 

उदाहरण स्वरूप :-

 

यहाँ पर मैं स्वयं अपना एक उदाहरण देना चाहता हूँ । यह बात करीब वर्ष 2002 की है । जब मैं एक योग शिक्षक प्रशिक्षण शिविर में आचार्य विशुपाल जयन्त के गुरुकुल में गया था जो कि कण्वाश्रम, उत्तराखंड स्थित है । यह वही गुरुकुल है जहाँ पर राजा भरत की शिक्षा हुई थी ।  वहाँ पर हमारा योगासन, दण्ड- बैठक, पीटी, जूडो- कराटे व लाठी आदि चलाने का प्रशिक्षण चलता था ।

 

सर्वप्रथम इस प्रकार के शिविरों में ही मैंने योग का प्रशिक्षण प्राप्त किया था । शिविर में पूरी दिनचर्या में हम सभी शिविरार्थियों का जब स्नान का समय होता था । उस समय हम सभी साथी वहाँ पर स्थित भीम ताल नामक छोटे से तालाब में नहाते थे । वह तालाब करीब 5 से 8 फीट गहरा तालाब था । हम सभी बच्चे भाग- भाग कर उसमें छलांग लगाते थे । उस समय हमारे साथ हमारे बहुत ही वरिष्ठ व्यायाम शिक्षक वीरदेव जी भी हमारे साथ थे । वो सभी बच्चों की देख- रेख करते थे । जब हम एक दिन स्नान कर रहे थे तो उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि तुम एक बार फिर से छलांग लगाओ । मैंने उनसे पूछा कि मैंने कुछ गलती कर दी क्या ? उन्होंने कहा नहीं- नहीं ऐसा नहीं है । मैं कुछ देखना चाहता हूँ । तो मैंने उनके आग्रह पर एक बार फिर से छलांग लगा दी।

 

उसके बाद उन्होंने एक- एक करके सभी बच्चों से छलांग लगवाई । हम सभी उत्सुक थे कि वीरदेव जी क्या देखना चाहते हैं ? सभी के छलांग लगाने के बाद उन्होंने कहा कि जब सोमवीर छलांग लगाता है तो इसका सिर पानी के अन्दर नहीं जा रहा । और बाकी सभी का सिर पानी के अन्दर जा कर फिर बाहर निकलता है । जबकि सोमवीर का सिर हर बार पानी के ऊपर ही रहता है । यह सुनकर सभी ने कई- कई बार दुबारा से छलांग लगाई । लेकिन परिणाम वही रहा । सभी के सिर पानी के नीचे जा रहे थे । लेकिन मेरा सिर पानी के नीचे नहीं जा रहा था । जबकि सिद्धान्त तो यही है कि पानी में जो भी छलांग लगाता है । वह अवश्य ही पहले नीचे जाता है । और फिर वह बाहर निकलता है।

 

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मैं वहाँ पर सबसे पतला या कम वजन का था । बल्कि वहाँ पर कुछ मुझसे भी पतले व हल्के थे।

 

इस दृष्टांत से मैं यह दावा नहीं कर रहा हूँ कि मैं कोई सिद्ध योगी हूँ । या मैंने कोई चमत्कार किया है । बल्कि मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि ऐसा भी हो सकता है । अब मेरे लिए यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि यह सब कैसे सम्भव हुआ ? या और कितने व्यक्ति हैं जो इस प्रकार कर सकते हैं?

 

इस घटना के कई वर्षों तक मैं इसी अभ्यास को अपने गाँव में स्थित नहर में भी करता था । और वहाँ भी यही होता था कि मेरा सिर पानी के भीतर नहीं जाता था और बाकी सभी मित्रों का सिर नीचे जाता था।

 

अब कुछ वर्षों से समय की व्यस्तता के चलते नहर या किसी तालाब में नहाने का अवसर नहीं मिला है । जिसके कारण यह कहना मुश्किल है कि अभी भी मेरे साथ वैसा ही होता है या नहीं।

 

आप में से जो भी व्यक्ति तैरना जानते हैं वह एक बार इसको अवश्य करके देखें । लेकिन जो व्यक्ति तैरना नहीं जानते कृपया वह इस विधि को करने का प्रयास न करें । अन्यथा हानि होने की पूर्ण सम्भावना हो सकती है।

 

आप सभी इसे पूर्व जन्म के संस्कार कहो या फिर इस जन्म की योग साधना । लेकिन यह बात बिलकुल सत्य है कि मैं उस समय पूज्य गुरुवर आचार्य हरपाल शास्त्री जी के मार्गदर्शन में पूरी तन्मयता के साथ योगाभ्यास करता था।

 

अतः यहाँ पर मेरे इस अनुभव को बताने का यही उद्देश्य था कि योगी के आकाश गमन की जो सिद्धि होती है । वह सम्भव है असम्भव नहीं । फिर चाहे वह कुछ ही फीट की ऊंचाई तक उठे।

 

बाकी यह सब अनुभव के विषय हैं । वर्षों की साधना के बाद जिनका साक्षात्कार किया जा सकता है।

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  1. Pranaam Sir! ?? thank you for sharing your story with us. We are all so fortunate to have amongst us a real life Siddha yogi??

  2. Prakriti ne issliye aapko Chuna hai yog margdarsak ke roop me
    Jaroor aapke purwajo me koi Maha risi satta ke yogi huen honge

  3. ??प्रणाम आचार्य जी! सूत्रो के इस श्रंखला मे यह सूत्र बहुत ही सुंदरता से पिरोया गया । तन्मयता के साथ अभ्यास का यह सुंदर परिणाम है कि आज हम सभी पतंजलि योगसूत्र का सव॔श्रेष्ठ स्वरूप अध्ययन कर रहे है । आचार्य जी आपके इस सुंदर लगन को कोटि कोटि प्रणाम व धन्यवाद! ओम ?

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