बलेषु हस्तिबलादीनि ।।  24 ।।

 

शब्दार्थ :- बलेषु ( अलग- अलग प्रकार के बलों में संयम करने से ) हस्तिबलादीनि ( हस्ति अर्थात हाथी आदि के बल की तरह ही अलग- अलग प्रकार के बलों की प्राप्ति होती है )

 

 

सूत्रार्थ :- अलग- अलग प्रकार के बलों में संयम करने से योगी को हाथी आदि के समान ही अलग- अलग प्रकार के बलों की प्राप्ति हो जाती है ।

 

 

व्याख्या :- इस सूत्र में बल में संयम करने से मिलने वाले फल की चर्चा की गई है ।

 

यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूत्र में हस्ति अर्थात हाथी शब्द का प्रयोग किया गया है । जिसे सबसे ज्यादा बलशाली पशु के रूप में जाना जाता है । जब योगी भिन्न- भिन्न प्रकार के बलों में संयम धारण करता है, तब उसे भिन्न- भिन्न प्रकार के बलों की प्राप्ति होती है ।

 

जैसे कि जब योगी हाथी के बल में संयम करता है तो उसे हाथी के समान ही बल की प्राप्ति होती है । यदि वह गरुड़ पक्षी के बल में संयम करता है तो उसे गरुड़ पक्षी के जैसे ही बल की प्राप्ति होती है । और यदि योगी वायु में संयम को धारण करता है तो उसे वायु के समान ही बल प्राप्त होता है ।

 

इसके अतिरिक्त भी योगी द्वारा जिस- जिस प्राणी के बल में संयम किया जाता है । तब योगी को उसी प्रकार के बल की प्राप्ति होती है ।

 

सामान्य रूप से भी यदि हम देखें तो हम जिस भी प्रकार के व्यक्ति को अपना आदर्श मानते हैं । या फिर हम जिस प्रकार का बनना चाहते हैं उसी प्रकार की योग्यता वाले व्यक्ति के सभी सिद्धान्तों की अनुपालना ( मानना ) करना शुरू कर देतेे हैं । जिसका परिणाम यह होता है कि हम स्वयं भी लगभग उसी प्रकार के गुणों से युक्त हो जाते हैं । यही बात इस सूत्र में कही गई है ।

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  1. ??Prnam Aacharya ji! Sanyam is a good way to recognise what is our soul and the power of soul which we are searching somewhere else although it exists in ourselves .it’s a beautiful Sutra.We are again and again thankful to you. DHNYAVAD Aacharya ji! ??

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