समानजयाज्ज्वलनम् ।। 40 ।।

 

शब्दार्थ :- समान ( समान नामक प्राण के ) जयात् ( जीतने से ) ज्वलनम् ( तेजस्विता आती है )

 

सूत्रार्थ :- समान नामक प्राण पर विजय प्राप्त करने के बाद योगी के शरीर में तेजस्विता आ जाती है ।

 

व्याख्या :- इस सूत्र में समान नामक प्राण की सिद्धि का फल बताया गया है ।

 

समान नामक प्राण हमारे शरीर में हृदय से नाभि तक स्थित होता है । यह इसका कार्यक्षेत्र है । जैसा कि हमने इससे पहले वाले सूत्र में समान प्राण के कार्य बताते हुए कहा था कि यह हमारे पाचन तंत्र को मजबूत करने का काम करता है । साथ ही यह समान रूप से पूरे शरीर को ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है ।

 

जिस प्रकार गाड़ी को चलाने के लिए ईंधन ( पैट्रोल, डीजल, गैस ) की आवश्यकता होती है । ठीक वैसे ही हमारे शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी ईंधन की आवश्यकता होती है । इस शरीर को चलाने वाला ईंधन हमें भोजन आदि खाद्य पदार्थों से प्राप्त होता है ।

 

जो भी आहार हम ग्रहण करते हैं । सबसे पहले वह हमारे आमाशय में जा कर इकट्ठा होता है । जहाँ पर उसका पाचन आरम्भ होता है । भोजन को पचाने का कार्य जठराग्नि द्वारा ही सम्भव होता है । जिस व्यक्ति की जठराग्नि जितनी अधिक प्रदीप्त ( उज्ज्वल या मजबूत ) होगी । उस व्यक्ति का पाचन तंत्र भी उतना ही मजबूत होगा ।

 

इस प्रकार जब योगी समान नामक प्राण को योग साधना से सिद्ध कर लेता है । तब उसका समान प्राण पर पूर्ण रूप से अधिकार हो जाता है । इससे उसका पाचन तंत्र बहुत मजबूत हो जाता है । जिस प्रकार योग के ग्रन्थों में कहा भी गया है कि योगी का पाचन तंत्र अत्यधिक मजबूत होता है । योगाभ्यास करने से योगी का पाचन तंत्र इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह विष के प्रभाव को भी कम कर देता है ।

 

पाचन तंत्र के मजबूत होने से उसका सीधा प्रभाव शरीर की ऊर्जा पर पड़ता है । जो योगी अच्छा सात्विक आहार लेता है और योगाभ्यास से समान प्राण को जीत लेता है । वह निश्चित तौर से तेजस्वी ही होगा । क्योंकि जब भोजन का पाचन सही प्रकार से हो जाता है तो वह ऊर्जा के रूप में शरीर को उद्दीप्त ( ऊर्ध्व गति )  करने का काम करता है ।

 

इस सूत्र का यही निष्कर्ष निकलता है कि समान प्राण पर विजय प्राप्त करने से पाचन तंत्र अत्यधिक मजबूत बन जाता है । जिससे योगी द्वारा लिए गए आहार का अच्छे से पाचन होने से वह दिन- प्रतिदिन ऊर्ध्व गति को प्राप्त करता है । अर्थात उसके मस्तक पर अलग ही आभा दिखाई देती है ।

इसी से योगी का शरीर दीप्तिमान हो उठता है ।

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  1. ??प्रणाम आचार्य जी! सूत्र व इसकी व्याख्या बहुत ही सुंदर है!धन्यवाद ?

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