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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 2 [51-53]

अध्याय 2: सांख्ययोग

मूल श्लोक · 2.51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌ ।। 51 ।।

व्याख्या

समबुद्धि से युक्त मनीषी अथवा ऋषिगण प्रत्येक कर्म ( कार्य ) को फल की आसक्ति ( इच्छा ) से रहित होकर करते हैं । जिससे वह जन्म- मरण के बन्धन व दुःखों अथवा शोक से पूरी तरह मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं ।

मूल श्लोक · 2.52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।। 52 ।।

व्याख्या

जिस समय तुम्हारी ( अर्जुन ) बुद्धि अपने स्वजनों के मोह रूपी दलदल से पूरी तरह से मुक्त हो जाएगी अथवा इस दलदल को पार कर जाएगी । तब तुमने जो सुना है या जो सुनना शेष ( बचा ) है । उन सबके प्रति तुम्हे उदासीनता अथवा वैराग्य का भाव आ जाएगा ।

मूल श्लोक · 2.53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।। 53 ।।

व्याख्या

शास्त्रों अथवा मतों की अलग- अलग प्रकार की बातें सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि समाधि वृत्ति से पूरी तरह स्थिर व शान्त हो जाएगी । इसी के कारण तुम्हे योग अर्थात् समत्वं योग की प्राप्ति होगी ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Shikha Arya

    Dhyanawaad guruji

  2. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about sumbuddi human being.

  3. Anshu

    Prnam Aacharya ji… This salika is so much heart touching….. Well explained,

  4. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव !

    आपका हृदय से आभार प्रेषित करता हूं।