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Shrimad Bhagwad Geeta

Geeta Introduction – 10

अध्याय 10: विभूतियोग

अध्याय परिचय

दसवां अध्याय ( विभूतियोग )

जिस प्रकार अध्याय के नाम से ही विदित होता है कि इसमें भगवान की विभूतियों का वर्णन किया गया है ।

इसमें कुल बयालीस ( 42 ) श्लोक कहे गए हैं । जब अर्जुन प्रश्न करता है कि हे जनार्दन ! आप उन सभी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करो ताकि मैं उनको सुनकर तृप्त हो सकूँ ।

इसके उत्तर में श्रीकृष्ण विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! अब मैं तुम्हारे सामने अपनी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करता हूँ । पूरे ध्यान से इनको सुनो । सभी प्राणियों में निवास करने वाला आत्मा मैं ही हूँ, बारह आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, तेजस्वियों में मैं सूर्य हूँ, उन्नचास मरुतों मे मैं मरीचि हूँ, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्यारह रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्षों व राक्षसों में मैं कुबेर हूँ, आठ वासुओं में मैं अग्नि हूँ, पर्वतों में मैं मेरु पर्वत हूँ, पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूँ, सेनानायकों में मैं स्कन्द हूँ, जलाशयों में मैं समुद्र हूँ, सभी ऋषियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में मैं ओंकार हूँ, पदार्थों में मैं हिमालय हूँ, वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव ऋषियों में मैं नारद हूँ, गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ, मुनियों में मैं कपिल हूँ, मनुष्यों में मैं राजा हूँ, अस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ, नागों में मैं शेषनाग हूँ, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, मछलियों में मैं मगरमच्छ हूँ, जल स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ, नारियों में मैं कीर्ति, श्री वाणी,स्मृति, मेधा, धृति व क्षमा हूँ, महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ,  ऋतुओं में मैं वसन्त हूँ, वृण्णि वंशियों में मैं वासुदेव व पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मुनियों में व्यास व कवियों में शुक्राचार्य हूँ, सभी ज्ञानियों के ज्ञान में मैं हूँ । इस प्रकार मेरी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है । सार रूप में यह सम्पूर्ण जगत को मैं धारण किये हुए हूँ ।

दसवां अध्याय ( विभूतियोग )

जिस प्रकार अध्याय के नाम से ही विदित होता है कि इसमें भगवान की विभूतियों का वर्णन किया गया है ।

इसमें कुल बयालीस ( 42 ) श्लोक कहे गए हैं । जब अर्जुन प्रश्न करता है कि हे जनार्दन ! आप उन सभी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करो ताकि मैं उनको सुनकर तृप्त हो सकूँ ।

इसके उत्तर में श्रीकृष्ण विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! अब मैं तुम्हारे सामने अपनी विभूतियों का विस्तार से वर्णन करता हूँ । पूरे ध्यान से इनको सुनो । सभी प्राणियों में निवास करने वाला आत्मा मैं ही हूँ, बारह आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, तेजस्वियों में मैं सूर्य हूँ, उन्नचास मरुतों मे मैं मरीचि हूँ, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्यारह रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्षों व राक्षसों में मैं कुबेर हूँ, आठ वासुओं में मैं अग्नि हूँ, पर्वतों में मैं मेरु पर्वत हूँ, पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूँ, सेनानायकों में मैं स्कन्द हूँ, जलाशयों में मैं समुद्र हूँ, सभी ऋषियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में मैं ओंकार हूँ, पदार्थों में मैं हिमालय हूँ, वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव ऋषियों में मैं नारद हूँ, गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ, मुनियों में मैं कपिल हूँ, मनुष्यों में मैं राजा हूँ, अस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ, नागों में मैं शेषनाग हूँ, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, मछलियों में मैं मगरमच्छ हूँ, जल स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ, नारियों में मैं कीर्ति, श्री वाणी,स्मृति, मेधा, धृति व क्षमा हूँ, महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ,  ऋतुओं में मैं वसन्त हूँ, वृण्णि वंशियों में मैं वासुदेव व पाण्डवों में अर्जुन हूँ, मुनियों में व्यास व कवियों में शुक्राचार्य हूँ, सभी ज्ञानियों के ज्ञान में मैं हूँ । इस प्रकार मेरी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है । सार रूप में यह सम्पूर्ण जगत को मैं धारण किये हुए हूँ ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    nice dr sahab.

  2. jyoti sharma

    Thank you sir

  3. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    बहुत ही उत्तम संक्षिप्त परिचय।