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Shrimad Bhagwad Geeta

Geeta Introduction – 17

अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग

अध्याय परिचय

सत्रहवां अध्याय ( श्रद्धात्रय विभागयोग )

इस पूरे अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप व दान के तीन - तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । इसलिए इस अध्याय का नाम श्रद्धात्रय रखा गया है । जिसमें श्रद्धा के साथ- साथ अन्य अंगों के भी तीन- तीन प्रकार बताये गए हैं ।

इसमें कुल अठाईस ( 28 ) श्लोक कहे गए हैं । सर्वप्रथम श्रद्धा के तीन प्रकारों ( सात्त्विकी श्रद्धा, राजसिक श्रद्धा व तामसिक श्रद्धा ) को बताया गया है । जब अर्जुन पूछता है कि हे कृष्ण ! सात्त्विक, राजसिक व तामसिक श्रद्धा वाले भक्त किन- किन की उपासना करते हैं ? इसके उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं कि सात्त्विक श्रद्धा वाले देवताओं की, राजसिक श्रद्धा वाले यक्षों व राक्षसों की व तामसिक श्रद्धा वाले सदा भूत- प्रेतादि की उपासना करते हैं । इसके बाद आहार की चर्चा करते हुए कहा है कि व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ही आहार पसन्द होता है । सात्त्विक श्रद्धा वाले व्यक्ति सात्त्विक आहार ( बल, आरोग्यता, सुख व प्रीति बढ़ाने वाले पदार्थ ) को पसन्द करते हैं । राजसिक वृत्ति वालों को राजसिक आहार ( कड़वे, खट्टे, चटपटे व ज्यादा गर्म खाद्य पदार्थ ) पसन्द होते हैं और तामसिक वृत्ति वाले व्यक्ति तामसिक आहार ( दुर्गन्धित, बासी, नीरस व झूठा भोजन ) पसन्द करते हैं । इसके बाद तीन प्रकार के यज्ञ सात्त्विक, राजसिक व तामसिक बताए गए हैं । जो व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ही अच्छा लगता है । फल की आशा से रहित व्यक्ति सात्त्विक यज्ञ करता है । राजसिक वृत्ति वाला व्यक्ति फल की आशा व दिखावे के लिए राजसिक यज्ञ करता है और तामसिक व्यक्ति मूर्खतापूर्ण शास्त्रविधि के विरुद्ध या शास्त्रों से रहित यज्ञ करता है । इसी प्रकार तीन प्रकार का तप कहा गया है । सात्त्विक व्यक्ति शास्त्रों के अनुकूल उत्तम तप करता है । वहीं राजसिक व

प्रवृत्ति वाला व्यक्ति मान- सम्मान व दिखावे के लिए राजसिक तप करता है और तामसिक व्यक्ति स्वयं को कष्ट देते हुए शास्त्रों के विरुद्ध विधि से तामसिक तप करता है । इसी कड़ी में दान के तीन प्रकार बताए गए हैं । जो शास्त्रों के अनुकूल पात्र व्यक्ति को दान देता है वह सात्त्विक दान, जो दिखावे के लिए व मान- सम्मान के लिए दान देता है वह राजसिक दान और मूर्खतापूर्ण व गलत व्यक्ति को दिया गया दान तामसिक दान कहलाता है ।

इस प्रकार पूरे अध्याय में तीन प्रकार की प्रकृत्ति के अनुसार ही उसकी श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप, दान का वर्णन किया गया है ।

सत्रहवां अध्याय ( श्रद्धात्रय विभागयोग )

इस पूरे अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप व दान के तीन - तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । इसलिए इस अध्याय का नाम श्रद्धात्रय रखा गया है । जिसमें श्रद्धा के साथ- साथ अन्य अंगों के भी तीन- तीन प्रकार बताये गए हैं ।

इसमें कुल अठाईस ( 28 ) श्लोक कहे गए हैं । सर्वप्रथम श्रद्धा के तीन प्रकारों ( सात्त्विकी श्रद्धा, राजसिक श्रद्धा व तामसिक श्रद्धा ) को बताया गया है । जब अर्जुन पूछता है कि हे कृष्ण ! सात्त्विक, राजसिक व तामसिक श्रद्धा वाले भक्त किन- किन की उपासना करते हैं ? इसके उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं कि सात्त्विक श्रद्धा वाले देवताओं की, राजसिक श्रद्धा वाले यक्षों व राक्षसों की व तामसिक श्रद्धा वाले सदा भूत- प्रेतादि की उपासना करते हैं । इसके बाद आहार की चर्चा करते हुए कहा है कि व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ही आहार पसन्द होता है । सात्त्विक श्रद्धा वाले व्यक्ति सात्त्विक आहार ( बल, आरोग्यता, सुख व प्रीति बढ़ाने वाले पदार्थ ) को पसन्द करते हैं । राजसिक वृत्ति वालों को राजसिक आहार ( कड़वे, खट्टे, चटपटे व ज्यादा गर्म खाद्य पदार्थ ) पसन्द होते हैं और तामसिक वृत्ति वाले व्यक्ति तामसिक आहार ( दुर्गन्धित, बासी, नीरस व झूठा भोजन ) पसन्द करते हैं । इसके बाद तीन प्रकार के यज्ञ सात्त्विक, राजसिक व तामसिक बताए गए हैं । जो व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ही अच्छा लगता है । फल की आशा से रहित व्यक्ति सात्त्विक यज्ञ करता है । राजसिक वृत्ति वाला व्यक्ति फल की आशा व दिखावे के लिए राजसिक यज्ञ करता है और तामसिक व्यक्ति मूर्खतापूर्ण शास्त्रविधि के विरुद्ध या शास्त्रों से रहित यज्ञ करता है । इसी प्रकार तीन प्रकार का तप कहा गया है । सात्त्विक व्यक्ति शास्त्रों के अनुकूल उत्तम तप करता है । वहीं राजसिक व

प्रवृत्ति वाला व्यक्ति मान- सम्मान व दिखावे के लिए राजसिक तप करता है और तामसिक व्यक्ति स्वयं को कष्ट देते हुए शास्त्रों के विरुद्ध विधि से तामसिक तप करता है । इसी कड़ी में दान के तीन प्रकार बताए गए हैं । जो शास्त्रों के अनुकूल पात्र व्यक्ति को दान देता है वह सात्त्विक दान, जो दिखावे के लिए व मान- सम्मान के लिए दान देता है वह राजसिक दान और मूर्खतापूर्ण व गलत व्यक्ति को दिया गया दान तामसिक दान कहलाता है ।

इस प्रकार पूरे अध्याय में तीन प्रकार की प्रकृत्ति के अनुसार ही उसकी श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप, दान का वर्णन किया गया है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. jyoti sharma

    Thank you sir

  2. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    अठारह अध्यायों की संक्षिप्त

    व्याख्या से मात्र एक कदम दूर,

    बहुत ही उत्तम संक्षिप्त व्याख्या

    हृदय अत्यंत आह्लादित है।

  3. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about three type of parkarti.