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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 2 [54-58]

अध्याय 2: सांख्ययोग

स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण हैं ? · अर्जुन उवाच

मूल श्लोक · 2.54

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ।। 54 ।।

व्याख्या

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछता है कि हे केशव ! आप मुझे यह बताइये कि स्थितप्रज्ञ अथवा समाधिस्थ साधक की क्या परिभाषा या लक्षण होते हैं ? वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति किस प्रकार उठता- बैठता है व उसका बोलना व चलना किस प्रकार का होता है ?

विशेष

इस श्लोक में अर्जुन स्थितप्रज्ञ अथवा समाधिस्थ व्यक्ति के आचरण के विषय में पूछता है कि उसका व्यवहार कैसा होता है ?

स्थितप्रज्ञ के लक्षण · श्रीभगवानुवाच

मूल श्लोक · 2.55

प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ । आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।। 55 ।।

मूल श्लोक · 2.56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।। 56 ।।

मूल श्लोक · 2.57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ । नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।। 57 ।।

मूल श्लोक · 2.58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।। 58 ।।

व्याख्या

स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हे अर्जुन ! जिस समय कोई व्यक्ति अपनी सभी मनोकामनाओं अथवा इच्छाओं का त्याग कर देता है और अपने आत्मिक सुख द्वारा अपने आप ( स्वयं ) में ही सन्तुष्ट रहता है । उसी समय वह व्यक्ति स्थितप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त कर लेता है अथवा उसे ही स्थितप्रज्ञ कहा जाता है ।

दुःख में जिसके मन में कभी भी उद्वेग ( तनाव ) नहीं आता व सुख के प्रति जिसकी लालसा खत्म हो गई है । जिसके राग- द्वेष, भय और क्रोध आदि विकार नष्ट हो गए हैं । उस मुनि को स्थितप्रज्ञ कहते हैं ।

जो सभी बातों अथवा विषयों से आसक्ति या लगाव रहित हो चुका है । जिसका शुभ कार्यों अर्थात् अनुकूलता से लगाव व अशुभ अर्थात् प्रतिकूलता से द्वेष खत्म हो गया है । उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है अथवा उसे स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है ।

जिस प्रकार कछुआ खतरे को देखकर अपने सभी अंगों को मजबूत खोल में छुपा ( समेट ) लेता है । ठीक उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति आसक्ति रूपी खतरे को देखकर अपनी इन्द्रियों के विषयों से अपने मन को हटा अथवा दूर कर लेता है । तब उसे स्थिर बुद्धि समझना चाहिए ।

विशेष

ऊपर वर्णित चार श्लोकों में स्थितप्रज्ञ अथवा समाधिस्थ साधक के लक्षणों का वर्णन किया गया है । जोकि व्यवहारिक व परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है । इन सभी लक्षणों को अपने जीवन में आत्मसात करने से व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होगी । जिससे वह समाधिस्थ की अवस्था को शीघ्र ही प्राप्त कर सकता है । परीक्षा में भी इससे सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    dr sahab nice explain about stable person.

  2. Anshu

    Prnam Aacharya ji…. Sunder lekh