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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 2 [59-61]

अध्याय 2: सांख्ययोग

मूल श्लोक · 2.59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ।। 59 ।।

मूल श्लोक · 2.60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।। 60 ।।

व्याख्या

निराहार अर्थात् आहार के न ग्रहण करने के कारण शरीर में दुर्बलता आती है । जिसके कारण मनुष्य की विषयों ( कामनाओं ) के प्रति आसक्ति बाहरी रूप से छूट जाती है । लेकिन फिर भी उसमें विषयों के प्रति आन्तरिक आसक्ति बनी रहती है । परन्तु जिसने परब्रह्म को प्राप्त कर लिया हो, उसकी सभी सभी कामनाएं अथवा विषयों के प्रति आसक्ति स्वयं ही छूट जाती है ।

हे कौन्तेय ! इसका कारण यह है कि विषयों के प्रति आसक्त प्रबल इन्द्रियाँ प्रयत्नशील व्यक्ति के मन को विषयों की ओर बलपूर्वक ( जबरदस्ती ) अपनी ओर आकर्षित ( खींच ) कर लेती हैं ।

विशेष

जो व्यक्ति निराहार अर्थात् भूखे पेट रहता है या जिसे खाने के लिए खाना नहीं मिल पाता । उस व्यक्ति की इन्द्रियाँ कमजोर होने के कारण काम - विषयों के प्रति आसक्त नहीं होती हैं । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि उसको विषयों के प्रति वैराग्य हो गया है । बल्कि शारीरिक कमजोरी के कारण ऐसा होता है । जैसे ही उसे खाने के लिए उपयुक्त आहार मिलता है । वैसे ही उसकी विषयों के प्रति आसक्ति फिर से बढ़ने लगती है । परन्तु जब साधक को परब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है । तब उसे सभी कामनाओं या विषय - वासनाओं से वैराग्य हो जाता है ।

मूल श्लोक · 2.61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।। 61 ।।

व्याख्या

अतएव साधक को संयम अर्थात् समत्वं योग का पालन करते हुए अपनी सभी इन्द्रियों को अपने अधीन करके परमात्मा का सहारा अथवा आश्रय लेकर ध्यान में बैठना चाहिए । ऐसा करने से साधक की सभी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं और जैसे ही उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं । वैसे ही उसकी बुद्धि भी स्थिर हो जाती है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Mamta

    Thank you sir

  2. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about sense organ control.

  3. INALA TRINATH

    Nice explanation.

    Myself working on the TATTVA in GITA for the last 20 years within the verse 7:3 where GOD says with authority and clarity that in the ultimate analysis only a microscopic or minuscule group realises GOD. This means majority are ignorant of GOD and HIS true inheritance.

    Would like share my work with like minded SOULS.

    Regards