योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌ । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।। 41 ।।     व्याख्या :-  हे धनंजय ! जिस मनुष्य ने योग द्वारा अपने सभी कर्मों का व ज्ञान द्वारा सभी संशयों को दूर ( त्याग ) कर दिया है, उस आत्मज्ञानी पुरूष को कर्मबन्धन कभी नहीं बाँधते ।        तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः

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Bhagwad Geeta Ch. 4 [41-42]

पाँचवा अध्याय ( कर्म सन्यासयोग ) इस अध्याय में मुख्य रूप से कर्मयोग व कर्मसन्यास योग की चर्चा की गई है । इसमें कुल उन्नतीस ( 29 ) श्लोकों का वर्णन है । इस अध्याय में कर्मयोग व सांख्ययोग को एक ही प्रकार का योग बताया है । जब अर्जुन पूछते हैं कि कर्मयोग व

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [1-3]

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ।। 4 ।।     व्याख्या :-   कुछ मूर्ख अथवा अज्ञानी व्यक्ति सांख्ययोग व कर्मयोग को अलग- अलग मानने की भूल करते हैं, लेकिन पण्डित अथवा विद्वान पुरुष ऐसा नहीं मानते । बल्कि विद्वानों का कहना है कि इनमें से ( सांख्ययोग व कर्मयोग में से

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [4-6]

कर्मों में अलिप्तता   योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ।। 7 ।।     व्याख्या :-  जो कर्मयोगी योगयुक्त हो गया है, जिसका अन्तःकरण ( मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त ) शुद्ध हो गया है, जिसने अपनी इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त कर लिया है अथवा जिसने अपनी इन्द्रियों को पूर्ण रूप

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [7-9]

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। 10 ।।     व्याख्या :-  जो व्यक्ति आसक्ति का त्याग करके अपने सभी कर्मों का ब्रह्मा में समर्पण करता है, वह पापों से उसी प्रकार अलिप्त ( अलग ) रहता है जिस प्रकार कमल के पत्ते कीचड़ अथवा पानी से अलिप्त

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [10-12]

मानव शरीर में स्थित नव द्वार   सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌ ।। 13 ।।     व्याख्या :-  सभी कर्मों में मन द्वारा सन्यास अथवा सांख्ययोग का पालन करने वाला पुरुष नवद्वारों वाले ( नौ द्वारों वाले ) शरीर रूपी नगर में बिना कर्म किये व करवाएं

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [13-17]

“विद्या ददाति विनयम”   विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।। 18 ।।     व्याख्या :-  जिन ज्ञानीजनों ने विद्या से प्राप्त होने वाले विनय को प्राप्त कर लिया है, वे ज्ञानीजन ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता व चाण्डाल आदि सभी प्राणियों में एक समान दृष्टि रखते हैं अर्थात् वह

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Bhagwad Geeta Ch. 5 [18-20]