कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपस: ।। 43 ।।   शब्दार्थ :- तपस: ( तप के पालन या प्रभाव से ) अशुद्धि- क्षयात् ( अशुद्धि का नाश होने से ) काय ( काया अर्थात शरीर की ) इन्द्रिय ( इन्द्रियों अर्थात कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की ) सिद्धि: ( सिद्धि प्राप्त होती है । )   सूत्रार्थ :- तप के अनुष्ठान

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Yoga Sutra 2 – 43

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोग: ।। 44 ।।   शब्दार्थ :- स्वाध्यायत् ( स्वाध्याय का पालन करने से ) इष्टदेवता ( जिसकी हम आराधना या उपासना करते हैं । ) सम्प्रयोग: ( उसका साक्षात्कार या उससे निकटता हो जाती है । )   सूत्रार्थ :- स्वाध्याय का पालन करने से हमें अपने इष्टदेव या आराध्य देव का साक्षात्कार या

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Yoga Sutra 2 – 44

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ।। 45 ।।   शब्दार्थ :- ईश्वर- प्रणिधानात् ( अपने समस्त कर्मों का समर्पण ईश्वर में करने से ) समाधि- सिद्धि: ( समाधि की सिद्धि अर्थात प्राप्ति होती है । )   सूत्रार्थ :- बिना किसी फल की इच्छा के अपने सभी कर्मों को ईश्वर में समर्पित करने से साधक को इस जीवन का

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Yoga Sutra 2 – 45

स्थिरसुखमासनम् ।। 46 ।।   शब्दार्थ :- स्थिर ( स्थिर अर्थात बिना हिले – डुले एक ही स्थिति में रहना ) सुखम् ( सुखमय अर्थात आरामदायक  स्थिति या अवस्था ) आसनम् ( आसन होता है । )    सूत्रार्थ :- शरीर की वह स्थिति जिसमें शरीर बिना हिले- डुले स्थिर व सुखपूर्वक अवस्था में रहता

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Yoga Sutra 2 – 46

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ।। 47 ।।   शब्दार्थ :- प्रयत्न ( सभी शारीरिक गतिविधियों या सभी प्रकार की शारीरिक कोशिशों को ) शैथिल्य ( शिथिल कर देना या रोक देना ) अनन्त ( जिसका कभी अन्त नहीं होता अर्थात ईश्वर या परमात्मा में  ) समापत्तिभ्याम् ( पूरा ध्यान लगाने से आसन में सिद्धि मिलती है । )

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Yoga Sutra 2 – 47

ततो द्वन्द्वानभिघात: ।। 48 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( तब अर्थात आसन की सिद्धि होने पर ) द्वन्द्व ( सर्दी – गर्मी ) भूख- प्यास, लाभ- हानि आदि ) अनभिघात ( आघात अर्थात कष्ट नहीं पहुँचाते )    सूत्रार्थ :- आसन के सिद्ध हो जाने पर साधक को सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, लाभ- हानि

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Yoga Sutra 2 – 48

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।। 49 ।।   शब्दार्थ :- तस्मिन् सति ( उसके बाद अर्थात आसन की सिद्धि के बाद ) श्वास ( पूरक अर्थात प्राणवायु को अन्दर लेने व ) प्रश्वासयो: ( रेचक अर्थात प्राणवायु को बाहर छोड़ने की ) गतिविच्छेद: ( सामान्य गति को अपनी सुविधानुसार रोक देना या स्थिर कर देना

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Yoga Sutra 2 – 49