शक्ति चालन मुद्रा के लाभ   तस्मात् सञ्चालयेन्नित्यं सुख सुप्ता मरुन्धतीम् । तस्या: सञ्चालनेनैव योगी रोगै: प्रमुच्यते ।। 119 ।।   भावार्थ :- इसलिए योगी साधक को नियमित रूप से उस सोई हुई अरुन्धती अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति का संचालन ( उसको चलाना ) करना चाहिए । केवल उसके संचालन मात्र से ही साधक के सभी

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Hatha Pradipika Ch. 3 [119-125]

राजयोग की उपयोगिता    राजयोगं विना पृथ्वी राजयोगं विना निशा । राजयोगं विना मुद्रा विचित्रापि न शोभते ।। 126 ।।   भावार्थ :- राजयोग के बिना सम्पूर्ण सुखों से भरी इस पृथ्वी का कोई प्रयोजन नहीं, न ही बिना राजयोग के रात्रि का कोई औचित्य है और बिना राजयोग के अनेक प्रकार की मुद्राएं भी

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Hatha Pradipika Ch. 3 [126-130]

भगवान शिव को नमस्कार   नमः शिवाय गुरवे नादबिन्दुकलात्मने । निरञ्जनपदं याति नित्यं यत्र परायण: ।। 1 ।।   भावार्थ :- जिस परम गुरु के प्रति निरन्तर समर्पित भाव से भक्ति करने मात्र से साधक को परमपद अर्थात् समाधि की प्राप्ति हो जाती है । उन नाद बिन्दु व कला स्वरूप गुरु भगवान शिव को

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Hatha Pradipika Ch. 4 [1-7]

गुरु का महत्त्व   राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्ति: स्थिति: सिद्धिर्गुरूवाक्येन लभ्यते ।। 8 ।।   भावार्थ :- राजयोग की उपयोगिता को कोई विरला ही जान पाता होगा । इसका ज्ञान, मुक्ति, अपने स्वरूप में स्थित होना व सिद्धि की प्राप्ति आदि का लाभ गुरु के उपदेश से ही प्राप्त होता

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Hatha Pradipika Ch. 4 [8-10]

उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनि: शेषकर्मण: । योगिन: सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ।। 11 ।।   भावार्थ :- कुण्डलिनी शक्ति के उत्पन्न होने अर्थात् जागृत होने व सभी कर्मों का त्याग (  सभी सकाम कर्म अर्थात् जो कर्म बन्धन का कारण बनते हैं ) करने से योगी की समाधि अपने आप ही लग जाती है । उसके लिए उसे

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Hatha Pradipika Ch. 4 [11-17]

सभी बहत्तर हजार ( 72000 ) नाड़ियाँ में सुषुम्ना की महत्ता   द्वासप्तति सहस्त्राणि नाडीद्वाराणि पञ्जरे । सुषुम्ना शाम्भवी शक्ति: शेषास्त्वेव निरर्थका: ।। 18 ।।   भावार्थ :- इस मानव शरीर में कुल बहत्तर हजार ( 72000 ) नाड़ियाँ है । इनमें से सुषुम्ना नाड़ी ही सबसे प्रमुख है जिसे शाम्भवी शक्ति भी कहते हैं

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Hatha Pradipika Ch. 4 [18-24]

  तत्रैकनाशादपरस्य नाश: एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्ति: । अध्वस्तयोश्चेन्द्रियवर्गवृत्ति: प्रध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धि: ।। 25 ।।   भावार्थ :- इन दोनों में से ( मन व प्राण ) यदि एक नष्ट ( उनकी गतिशीलता  ) हो जाता है तो दूसरा भी स्वयं ही नष्ट हो जाता है अर्थात् दूसरे की गति का नाश भी अपने आप ही हो जाता है

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Hatha Pradipika Ch. 4 [25-30]