शक्ति चालन मुद्रा के लाभ तस्मात् सञ्चालयेन्नित्यं सुख सुप्ता मरुन्धतीम् । तस्या: सञ्चालनेनैव योगी रोगै: प्रमुच्यते ।। 119 ।। भावार्थ :- इसलिए योगी साधक को नियमित रूप से उस सोई हुई अरुन्धती अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति का संचालन ( उसको चलाना ) करना चाहिए । केवल उसके संचालन मात्र से ही साधक के सभी …
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- Category: Hatha Pradipika








