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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [11-17]

अध्याय 4: समाधि

मूल श्लोक · 4.11

उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनि: शेषकर्मण: । योगिन: सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ।। 11 ।।

भावार्थ

कुण्डलिनी शक्ति के उत्पन्न होने अर्थात् जागृत होने व सभी कर्मों का त्याग (  सभी सकाम कर्म अर्थात् जो कर्म बन्धन का कारण बनते हैं ) करने से योगी की समाधि अपने आप ही लग जाती है । उसके लिए उसे किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं रहती ।

मूल श्लोक · 4.12

सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे । तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ।। 12 ।।

भावार्थ

साधक का प्राण जब सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर लेता है तो उसका मन भी शून्यभाव ( मन का विचारों से रहित होना ) को प्राप्त हो जाता है । तब साधक सभी प्रकार के क्रियाकलापों से पूरी तरह से मुक्त हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.13

अमराय नमस्तुभ्यं सोऽपि कालस्त्वया जित: । पतितं वदने यस्य जगदेतच्चराचरम् ।। 13 ।।

भावार्थ

जिस अमर योगी ने इस सारे जगत को अपने वश में रखने वाली मृत्यु को भी जीत लिया है । ऐसे श्रेष्ठ योगी को नमस्कार ।

मूल श्लोक · 4.14

चित्ते समत्वमापन्ने वायौ व्रजति मध्यमे । तदामरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ।। 14 ।।

भावार्थ

साधक का चित्त समभाव ( समता ) को प्राप्त होने पर उसका प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर लेता है । इस प्रकार प्राणवायु के सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने के बाद ही साधक की अमरोली, वज्रोली व सहजोली क्रियाएँ सिद्ध होती है ।

मोक्ष प्राप्ति

मूल श्लोक · 4.15

ज्ञानं कुतो मनसि सम्भवतीह तावत् प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् । प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयोद्यो मोक्षं स गच्छति नरो न कथञ्चिदन्य: ।। 15 ।।

भावार्थ

जब तक साधक के प्राण का निरन्तर प्रवाह होता रहता है तब तक उसका मन भी शान्त नहीं होता और मन के शान्त न होने से उसे यथार्थ ज्ञान ( वास्तविक ज्ञान ) की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? जो साधक अपने प्राणों व मन का पूरी तरह से निरोध कर लेता है । उसे ही मोक्ष की प्राप्ति होती है । अन्य किसी प्रकार से मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नहीं है ।

मूल श्लोक · 4.16

ज्ञात्वा सुषुम्ना सम्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् । स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरण्ध्रे निरोधयेत् ।। 16 ।।

भावार्थ

साधक को सदा सुन्दर स्थान पर बैठकर सुषुम्ना नाड़ी का अच्छी प्रकार से भेदन करके प्राणवायु को सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर प्रवेश करवाकर ब्रह्मरन्ध्र में उसका निरोध करना चाहिए ।

मूल श्लोक · 4.17

सूर्याचन्द्रमसौ धत्त: कालं रात्रिन्दिवात्मकम् । भोक्त्री सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ।। 17 ।।

भावार्थ

दिन और रात को सूर्य और चन्द्रमा धारण ( सूर्य और चन्द्रमा से ही दिन व रात का आभास होता है ) करते हैं । सुषुम्ना नाड़ी उस काल ( दिन व रात के समय ) को भोगने वाली है । इसे अत्यन्त गुप्त रहस्य कहा गया है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Vinod sharma

    प्रथम श्लोक के त्यक्तानि शब्द को दुरुस्त करें ।

    धन्यवाद ।

  2. Dr. Somveer Arya

    विनोद शर्मा जी श्लोक को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ।

    हठ प्रदीपिका लोनावला व हठ योगप्रदीपिका चौखम्बा संस्कृति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के अनुसार त्यक्तनि: शब्द ही सही है । लेकिन यदि आपके पास इससे सम्बंधित कोई प्रमाणिक तथ्य है तो मुझे भेजें ताकि मैं इसे दुरस्त कर सकूं । आपके लिए दोनों पुस्तकों की फोटो भेज रहा हूँ ।

    धन्यवाद ।

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से अभिनन्दन।