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  • Hatha Pradipika Ch. 4 [101-106]

तावदाकाशसङ्कल्पो यावच्छब्द: प्रवर्तते ।

नि:शब्दं तत् परं ब्रह्म परमात्मेति गीयते ।। 101 ।।

 

भावार्थ :- जहाँ तक आकाश की सीमा होती है वहीं तक नाद अर्थात् शब्द की सीमा होती है । इसका तात्पर्य यह है कि शब्द की उत्पत्ति आकाश नामक महाभूत से होती है । इसलिए जहाँ तक आकाश स्थित है वहीं तक शब्द अर्थात् नाद को सुना जा सकता है । जैसे ही शब्द को सुनने की सीमा समाप्त हो जाती है अर्थात् शून्य अवस्था आ जाती है । वैसे ही वह परब्रह्म अर्थात् परमात्मा की अवस्था आ जाती है । शब्द शून्यता को ही परमात्मा कहा जाता है ।

 

 

यत् किञ्चिन्नादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा ।

यस्तत्त्वान्तो निराकार: स एव परमेश्वर: ।। 102 ।।

 

भावार्थ :- जो भी नाद के रूप में हम ध्वनियाँ सुनाई देती हैं । वह शक्ति का ही रूप होता है और जहाँ पर इन तत्त्वों का अन्त हो जाता है अर्थात् जहाँ पर ये तत्त्व विलीन हो जाते हैं । वही परम तत्त्व अर्थात् परमात्मा है ।

 

 

सर्वे हठलयोपाया: राजयोगस्य सिद्धये ।

राजयोगसमारूढ: पुरुष: कालवञ्चक: ।। 103 ।।

 

भावार्थ :- हठयोग व लययोग की सभी साधना पद्धतियों का एकमात्र लक्ष्य राजयोग की प्राप्ति करना होता है । जो भी योगी हठयोग व लययोग साधना द्वारा राजयोग रूपी समाधि की प्राप्ति कर लेता है । वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है ।

 

 

तत्त्वं बीजं हठ: क्षेत्रमौदासीन्यं जलं त्रिभि: ।

उन्मनी कल्पलतिका सद्य: एव प्रवर्तते ।। 104 ।।

 

भावार्थ :- तत्त्व अर्थात् परमतत्त्व बीज के रूप में होता है और हठयोग साधना उस बीज के लिए भूमि ( खेत ) का काम करता है । साथ ही वैराग्य जल स्वरूप ( जल का प्रतिनिधि ) होता है । इन तीनों के एकसाथ मिलने से समाधि रूपी कल्पलता ( पौधा ) अति शीघ्र बढ़ने लगता है । तात्पर्य यह है कि हठयोग उपजाऊ भूमि है, वैराग्य उसको जल की आपूर्ति करता है । जिससे समाधि रूपी बेल या पौधा शीघ्रता से बढ़ने लगता है जिससे साधक को उस परम तत्त्व की प्राप्ति होती है ।

 

सदा नादानुसन्धानात् क्षीयन्ते पापसञ्चया: ।

निरञ्जने विलीयेते निश्चितं चित्त मारुतौ ।। 105 ।।

 

भावार्थ :- निरन्तरता के साथ नादानुसन्धान का अभ्यास करने वाले साधक के पाप अर्थात् दुःख के सारे समूह नष्ट हो जाते हैं । साथ ही उसका प्राण व मन ब्रह्मा ( परमात्मा ) में संयुक्त ( लीन ) हो जाते हैं ।

 

 

शङ्खदुन्दुभिनादं च न श्रृणोति कदाचन ।

काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ।। 106 ।।

 

भावार्थ :- उन्मनी ( समाधि ) अवस्था प्राप्त होने पर साधक का शरीर ध्रुव तारे व लकड़ी की तरह ही स्थिर हो जाता है । तब उस योगी को शंख व दुन्दुभि आदि तीव्र ध्वनि वाले नाद नहीं सुनाई देते ।

 

 

विशेष :- ध्रुव तारे की यह विशेषता होती है कि वह सदा एक ही जगह पर स्थिर रहता है । किसी भी परिस्थिति में वह अपनी जगह नहीं बदलता । अतः उसे स्थाई माना जाता है तभी यहाँ पर उसका उदाहरण दिया गया है । ठीक इसी प्रकार लकड़ी का टुकड़ा भी स्थिर होता है ।

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