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  • Hatha Pradipika Ch. 4 [94-100]

नादोन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते ।

अन्तरङ्कुरङ्गस्य वधे व्याधायतेऽपि च ।। 94 ।।

 

भावार्थ :-  मृग ( हिरण ) रूपी चंचल मन की चंचलता को बान्धने के लिए नादानुसन्धान का अभ्यास रस्सी की तरह काम करता है । जिस प्रकार चंचल हिरण को रस्सी या जाल से बान्ध कर एक जगह स्थिर किया जा सकता है । ठीक उसी प्रकार चंचल मन को स्थिर करने के लिए नादानुसंधान का अभ्यास करना चाहिए । साथ ही जिस प्रकार व्याध ( शेर ) हिरण को मार डालता है । ठीक उसी प्रकार नादानुसंधान रूपी शेर चंचल हिरण रूपी मन को मार देता है अर्थात् वह मन को अपने अन्दर लीन कर लेता है ।

 

 

अन्तरङ्गस्य यमिनो वाजिन: परिघायते ।

नादोपास्तिरतो नित्यमवधार्या हि योगिना ।। 95 ।।

 

भावार्थ :- यह नादानुसंधान की साधना मन रूपी घोड़े को रोकने के लिए चारदीवारी का कार्य करती है । जिस प्रकार घोड़ो को रोकने के लिए एक उनको एक प्रकार की ऊंची चारदीवारी की आवश्यकता होती है । इसलिए योगी को मन की चंचलता को रोकने के लिए नित्य प्रति नादानुसंधान की साधना करनी चाहिए ।

 

 

बद्धं विमुक्तचाञ्चल्यं नादगन्धकजारणात् ।

मन: पारदमाप्नोति निरालम्बाख्यखेऽटनम् ।। 96 ।।

 

भावार्थ :-  स्थिर अथवा बाँधा हुआ मन रूपी पारे को गन्धक रूपी नादानुसंधान से भस्म करने के बाद वह प्रभावहीन ( क्रियाहीन ) हो जाता है अथवा स्थिर हो जाता है । ठीक उसी प्रकार नादानुसंधान द्वारा एक जगह स्थिर किया हुआ मन भी बिना किसी आश्रय के आकाश में स्थित अथवा लीन हो जाता है ।

 

 

नादश्रवणत: क्षिप्रमन्तरङ्गभुजङ्गम: ।

विस्मृत्य सर्वमेकाग्र: कुत्रचिन्न हि धावति ।। 97 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार सांप बीन ( एक प्रकार का वाद्ययंत्र ) को सुनकर अति शीघ्रता से एकाग्र होकर उस ध्वनि ध्यान पूर्वक सुनता है । ठीक उसी प्रकार नाद की ध्वनि को सुनने के बाद सर्प ( सांप ) रूपी मन भी सबकुछ छोड़कर अति शीघ्रता से एकाग्रता को प्राप्त कर लेता है । अन्य किसी विषय के बारे में बिलकुल भी नहीं सोचता ।

 

 

काष्ठे प्रवर्तितो वह्नि: काष्ठेन सह शाम्यति ।

नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन सह लीयते ।। 98 ।।

 

भावार्थ :- जिस तरह लकड़ी में लगी हुई आग उस लकड़ी के समाप्त होने पर स्वयं ही समाप्त हो जाती है । ठीक उसी तरह नाद में लगा हुआ मन भी उस नाद में ही विलीन अथवा लीन हो जाता है ।

 

 

घण्टादिनादसक्तस्तब्धान्त: करणहरिणस्य ।

प्रहरणमपि सुकरं शरसन्धानप्रवीणश्चेत् ।। 99 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार घण्टा आदि वाद्ययंत्रों की ध्वनि को सुनकर हिरण उसी में अपने को एकाग्र करके एक जगह पर स्थिर हो जाता है । उस समय धनुर्धर रूपी साधक अपनी कुशल धनुर्विद्या रूपी नाद द्वारा उस हिरण रूपी मन का आसानी से शिकार कर सकता है अर्थात् वह चंचल मन को नाद रूपी बाण द्वारा भेद सकता है । जिससे मन आसानी से नाद के साथ लीन हो जाता है ।

 

 

अनाहतस्य शब्दस्य ध्वनिर्य उपलभ्यते ।

ध्वनेरन्तर्गतं ज्ञेयं ज्ञेयस्यान्तर्गतं मन: ।

मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णो: परमं पदम् ।। 100 ।।

 

भावार्थ :- अनाहत नाद से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसी के अन्दर जानने योग्य ब्रह्मा का निवास स्थान है और उस अनाहत नाद में ही हमारा मन पूरी तरह से लीन हो जाता है । इस स्थिति को विष्णु का परमपद अर्थात् सर्वोच्य स्थान कहा जाता है ।

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  1. लक्ष्मी नारायण योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिव्दार ।l says:

    ऊॅ ! धन्यवाद सर ।

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