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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [8-10]

अध्याय 4: समाधि

गुरु का महत्त्व

मूल श्लोक · 4.8

राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः । ज्ञानं मुक्ति: स्थिति: सिद्धिर्गुरूवाक्येन लभ्यते ।। 8 ।।

भावार्थ

राजयोग की उपयोगिता को कोई विरला ही जान पाता होगा । इसका ज्ञान, मुक्ति, अपने स्वरूप में स्थित होना व सिद्धि की प्राप्ति आदि का लाभ गुरु के उपदेश से ही प्राप्त होता है ।

मूल श्लोक · 4.9

दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरो: करुणां विना ।। 9 ।।

भावार्थ

उत्तम गुरु की विशेष कृपा के बिना विषयों अर्थात् आसक्ति का त्याग, यथार्थ ज्ञान का मिलना व सहजावस्था अर्थात् समाधि की अवस्था का प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है ।

मूल श्लोक · 4.10

विविधैरासनै: कुम्भैर्विचित्रै: करणैरपि । प्रबुद्धायां महाशक्तौ प्राण: शून्ये प्रलीयते ।। 10 ।।

भावार्थ

अनेक प्रकार के आसनों, कुम्भकों ( प्राणायाम ) व अनेक प्रकार की योग साधनाओं का अभ्यास करने से साधक कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है । जिससे प्राण सुषुम्ना नाड़ी में लीन ( मिल जाना ) हो जाता है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Anshu

    Prnam Aacharya ji! Sunder! Om

  3. Neelam

    Nice

  4. Vinod sharma

    अति सुंदर ।।

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Narender

    Thanks sir

  7. Virendra Kumar

    Thank you sir

  8. Anshu

    Prnam Aacharya Ji. DHANYAVAD