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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [25-30]

अध्याय 4: समाधि

मूल श्लोक · 4.25

तत्रैकनाशादपरस्य नाश: एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्ति: । अध्वस्तयोश्चेन्द्रियवर्गवृत्ति: प्रध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धि: ।। 25 ।।

भावार्थ

इन दोनों में से ( मन व प्राण ) यदि एक नष्ट ( उनकी गतिशीलता  ) हो जाता है तो दूसरा भी स्वयं ही नष्ट हो जाता है अर्थात् दूसरे की गति का नाश भी अपने आप ही हो जाता है । ठीक इसी प्रकार एक के गतिशील होने पर दूसरा भी गतिशील हो जाता है । जब यह दोनों ( मन व प्राण ) निरन्तर गतिशील रहते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ भी अपने - अपने विषयों में प्रवृत्त रहती हैं । लेकिन जैसे ही यह दोनों गतिविहीन हो जाते हैं अर्थात् जब इनमें स्थिरता आ जाती है । तब साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

मूल श्लोक · 4.26

रसस्य मनसश्चैव चञ्चलत्वं स्वभावतः । रसो बद्धो मनो बद्धं किं न सिद्धयति भूतले ।। 26 ।।

भावार्थ

मन व पारा ( पारा एक धातु है ) दोनों की प्रकृति ( स्वभाव )  चंचल होते हैं अर्थात् यह दोनों मूल रूप से चंचल होते हैं । यदि पारा धातु को बांध लिया जाए और मन को एक जगह पर स्थिर कर दिया जाए तो उस साधक के लिए ( जिसने मन को स्थिर कर लिया है ) इस पूरी पृथ्वी पर ऐसा क्या है जिसे वह प्राप्त नहीं कर सकता ? अर्थात् इस पूरी पृथ्वी पर उसके लिए सबकुछ सम्भव हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.27

मुर्च्छितो हरते व्याधीन् मृतो जीवयति स्वयम् । बद्ध: खेचरतां धत्ते रसो वायुश्च पार्वति ।। 27 ।।

भावार्थ

हे पार्वती ! पारा धातु को शोधित करने पर ( उसकी भस्म बना देने से ) और प्राण की गति को मन्द करने से यह दोनों ही रोगों को दूर करने का काम करते हैं । पारा धातु स्वयं मरके दूसरों को जीवन प्रदान करता है ( जब पारा धातु को तीव्र अग्नि में भस्म किया जाता है तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को खो देता है अथवा उसकी स्वयं की सत्ता समाप्त हो जाती है ) । पारा बांधे जाने से और प्राण का निरोध होने पर वह ऊर्ध्वगामी होकर साधक को आकाश गमन की सिद्धि प्रदान करते हैं ।

मूल श्लोक · 4.28

मन: स्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिन्दु: स्थिरो भवेत् । बिन्दुस्थैर्यात् सदा सत्त्वं पिण्डस्थैर्यं प्रजायते ।। 28 ।।

भावार्थ

मन के स्थिर हो जाने से हमारा प्राण भी स्थिर हो जाता है । जिससे वीर्य भी शरीर में स्थिर हो जाता है और वीर्य के शरीर में स्थिर होने से सदा शक्ति और स्थिरता बनी रहती है ।

मूल श्लोक · 4.29

इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुत: । मारुतस्य लयो नाथ: स लयो नादमाश्रित: ।। 29 ।।

भावार्थ

हमारी सभी इन्द्रियों को नियंत्रित करने वाला अथवा उनका स्वामी मन है और उस मन को नियंत्रित करने वाला अथवा उसका स्वामी प्राण है । उस प्राण को नियंत्रित करने वाला लय होता है और वह लय नाद पर आश्रित होता है अर्थात् नाद लय का स्वामी होता है ।

मूल श्लोक · 4.30

सोऽयमेवास्तु मोक्षाख्यो मास्तु वापि मतान्तरे । मन: प्राणलये कश्चिदानन्द: सम्प्रवर्तते ।। 30 ।।

भावार्थ

कुछ आचार्यों के मतानुसार इस लय को ही मोक्ष नाम से जाना जाता है अर्थात् लय को ही मोक्ष कहा गया है । वहीं कुछ आचार्यों के अनुसार ऐसा नहीं माना जाता । लेकिन मन और प्राण दोनों के लयबद्ध होने से साधक को एक आनन्द की अनुभूति होती है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Devashree Marathe

    आचार्य जी आपने चलं वाते चले चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्! बहोत सुंदर पद्धती से समझाया हैं. धन्यवाद .

  2. Sarita

    शुक्रिया गुरूजी

  3. लक्ष्मी नारायण योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिव्दार ।l

    ऊॅ ! सर जी । बहुत ही अच्छे तरीके से आप ने समझाया ।पर प्राण को नियन्त्रित करने वाला लय है तो लय की सिध्दी कैसे होगी कृपया समझाने का कष्ट कीजिए सर ।

  4. Neelam

    Very nice information , thank you sir

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Rita

    Thanks sir