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  • Hatha Pradipika Ch. 3 [119-125]

शक्ति चालन मुद्रा के लाभ

 

तस्मात् सञ्चालयेन्नित्यं सुख सुप्ता मरुन्धतीम् ।

तस्या: सञ्चालनेनैव योगी रोगै: प्रमुच्यते ।। 119 ।।

 

भावार्थ :- इसलिए योगी साधक को नियमित रूप से उस सोई हुई अरुन्धती अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति का संचालन ( उसको चलाना ) करना चाहिए । केवल उसके संचालन मात्र से ही साधक के सभी रोग दूर हो जाते हैं ।

 

 

येन सञ्चालिता शक्ति: स योगी सिद्धिभाजनम् ।

किमत्र बहुनोक्तेन कालं जयति लीलया ।। 120 ।।

 

भावार्थ :- जिस भी साधक ने इस कुण्डलिनी शक्ति का संचालन करना आ गया । उसे सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । इस विषय में और क्या कहना ? इसमें तो साधक मृत्यु पर भी बड़ी आसानी से जीत प्राप्त कर लेता है ।

 

 

ब्रह्मचर्यरतस्यैव नित्यं हितमिताशन: ।

मण्डलाद् दृश्यते सिद्धि: कुण्डल्यभ्यासयोगिन: ।। 121 ।।

 

भावार्थ :- जो भी योग साधक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है, शीघ्रता से पचने वाला हितकारी आहार ग्रहण करता है और कुण्डलिनी को चलाता है उसे एक मण्डल अर्थात् चालीस ( 40 ) दिनों में ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है ।

 

 

कुण्डलीं चालयित्वा तु भस्त्रां कुर्याद्विशेषत: ।

एवमभ्यसतो नित्यं यमिनो यमभी: कुत: ।। 122 ।।

 

भावार्थ :- कुण्डलिनी को चलाते समय भस्त्रिका प्राणायाम को विशेष रूप से करना चाहिए । इस प्रकार नियमित रूप से कुण्डलिनी चलाते हुए भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास करने से योगी को मृत्यु के देवता अर्थात् यमराज का भय कैसा ?

ऊपर वर्णित श्लोक में कहा गया है कि जब योगी इस विधि का नियमित रूप से पालन करता है तो उसे मृत्यु का भी भय नहीं रहता ।

 

बहत्तर हजार ( 72000 ) नाड़ियों की शुद्धि

 

द्वासप्ततिसहस्त्राणां नाडीनां मलशोधने ।

कुत: प्रक्षालनोपाय: कुण्डल्यभ्यसनादृते ।। 123 ।।

 

भावार्थ :- कुण्डलिनी शक्ति के अभ्यास के बिना शरीर में स्थित बहत्तर हजार ( 72000 ) नाड़ियों के मल अर्थात् अशुद्धि को दूर करने का कोई दूसरा तरीका कहाँ है ?

इसका अर्थ है कि सभी नाड़ियों को शुद्ध करने का एकमात्र उपाय कुण्डलिनी शक्ति ही है अन्य कोई नहीं ।

 

 

इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।

आसनप्राणसंयाम मुद्राभि: सरला भवेत् ।। 124 ।।

 

भावार्थ :- योगियों द्वारा किए गए आसन, प्राणायाम व मुद्राओं के दृढ़ अभ्यास से ही सुषुम्ना नाड़ी ऊर्ध्वगमन के लिए उपयुक्त अथवा सरल हो जाती है ।

 

 

अभ्यासे तु विनिद्राणां मनो धृत्वा समाधिना ।

रुद्राणी वा परा मुद्रा भद्रां सिद्धिं प्रयच्छति ।। 125 ।।

 

भावार्थ :- जो साधक पूरी सजगता अथवा जागरूकता के साथ योग का अभ्यास करते हैं । वह समाधि के द्वारा अपने मन को एक जगह पर स्थिर करके शाम्भवी मुद्रा या कल्याण करने वाली सिद्धियों को प्राप्त कर लेते हैं ।

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