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  • Hatha Pradipika Ch. 3 [104-111]

शक्तिचालन मुद्रा वर्णन

 

कुटिलाङ्गी कुण्डलिनी भुजङ्गी शक्तिरीश्वरी ।

कुण्डल्यरुन्धती चैते शब्दा: पर्यायवाचका: ।। 104 ।।

 

भावार्थ :- कुटिलाङ्गी, कुण्डलिनी, भुजङ्गी, शक्ति, ईश्वरी, कुण्डली और अरुन्धती इन सभी शब्दों का एक ही अर्थ होता है अर्थात् यह सभी एक ही शब्द ( कुण्डलिनी ) के पर्यायवाची हैं । जहाँ- जहाँ पर भी इन शब्दों का प्रयोग किया गया है । वहाँ पर उसका अर्थ यही ( कुण्डलिनी ) होगा ।

 

विशेष :- इस श्लोक में कुण्डलिनी के सभी पर्यायवाची शब्दों को बताया गया है ।

 

 

उद्घाटयेत् कपाटं तु यथा किञ्चिकया हठात् ।

कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ।। 105 ।।

 

भावार्थ :- जिस प्रकार चाबी के द्वारा बन्द द्वार ( दरवाजे ) को बिना किसी प्रकार की मेहनत के आसानी से खोल दिया जाता है । ठीक उसी प्रकार योगी बिना किसी ज्यादा प्रयास के कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा मोक्ष के द्वार को खोल लेते हैं ।

 

 

येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ।

मुखेनाच्छाद्य तद् द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ।। 106 ।।

 

भावार्थ :- जो मार्ग ( रास्ता ) सभी प्रकार के कष्टों से रहित होकर ब्रह्मस्थान तक पहुँचता है । उस मार्ग के द्वार ( दरवाजे ) को बन्द करके कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई है ।

 

 

कन्दोर्ध्वं कुण्डलीशक्ति: सुप्ता मोक्षाय योगिनाम् ।

बन्धनाय च मूढानां यस्तां वेत्ति स योगवित् ।। 107 ।।

 

भावार्थ :- कन्द ( कुण्डलिनी का स्थान )  के ऊपर कुण्डलिनी शक्ति सुप्त अवस्था अर्थात् निष्क्रिय रूप में पड़ी हुई है । उस कुण्डलिनी शक्ति की साधना करके ही साधक मोक्ष को प्राप्त करता है । लेकिन जो मूढ अर्थात् कम बुद्धि वाले लोग हैं उन सबके लिए तो यह बन्धन का कारण होती है । योग साधना को जानने वाला साधक ही इसकी उपयोगिता को जानता है ।

 

 

कुण्डली कुटिलाकारा सर्पवत् परिकीर्तिता ।

सा शक्तिश्चालिता येन स मुक्तो नात्र संशय: ।। 108 ।।

 

भावार्थ :- यह कुण्डलिनी शक्ति सर्प की भाँति टेढ़ी- मेढ़ी आकृति वाली होती है अर्थात् जिस प्रकार साँप टेढ़ा- मेढ़ा होता है ठीक उसी प्रकार इस कुण्डलिनी की आकृति भी वैसी ही होती है । जो योग साधक इस कुण्डलिनी शक्ति को क्रियाशील ( जागृत अवस्था ) कर लेता है । नि: सन्देह वह मुक्त हो जाता है ।

 

 

गङ्गायमुनयोर्मध्ये बाल रण्डां तपस्विनीम् ।

बलात्कारेण गृह् णीयात् तद्विष्णो: परमं पदम् ।। 109 ।।

 

भावार्थ :- गंगा अर्थात् चन्द्र नाड़ी व यमुना अर्थात् सूर्य नाड़ी के बीच में तपस्विनी बालरण्डा अर्थात् कुण्डलिनी स्थित है । साधक को इस कुण्डलिनी  शक्ति को पूरे प्रयत्न के साथ क्रियाशील करना चाहिए । यही विष्णु के परमपद अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करवाने वाली शक्ति है ।

 

 

इडा भगवती गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी ।

इडापिङ्गलयोर्मध्ये बालरण्डा च कुण्डली ।। 110 ।।

 

भावार्थ :- इडा नाड़ी अर्थात् चन्द्र नाड़ी को भगवती गंगा नदी व पिङ्गला अर्थात् सूर्य नाड़ी को यमुना नदी कहते हैं । इन दोनों नाड़ियों के बीच में बालरण्डा अर्थात् सुषुम्ना नाड़ी स्थित है । जिसे कुण्डलिनी कहा जाता है ।

 

पुच्छे प्रगृह्य भुजगीं सुप्ता मुद् बोधयेच्च ताम् ।

निद्रां विहाय सा शक्तिरूर्ध्वमुत्तिष्ठते हठात् ।। 111 ।।

 

भावार्थ :- सोई हुई प्राणशक्ति या निष्क्रिय पड़ी हुई कुण्डलिनी शक्ति को पूंछ पकड़कर जगाना चाहिए । जिस प्रकार सोए हुए साँप को जगाते हैं । इस प्रकार उसे जगाने से वह सहज रूप से ही जागृत होकर ठीक उसी प्रकार ऊपर की ओर उठती है जिस प्रकार साँप जागने के बाद उठता है ।

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