षट्कर्म का अभ्यास कौन करे ?  मेद:श्लेष्माधिक: पूर्वं षट्कर्माणि समाचरेत् । अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोषाणां समभावत: ।। 21 ।।   भावार्थ :- जिन व्यक्तियों के शरीर में चर्बी अर्थात मोटापा और कफ ज्यादा है उनको पहले आगे कही जाने वाली छ: शुद्धि क्रियाओं का अच्छे से अभ्यास करना चाहिए । इसके अलावा जिन व्यक्तियों के वात,

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Hatha Pradipika Ch. 2 [21-23]

धौति क्रिया   चतुरङ्गुलविस्तारं हस्तपञ्चदशायतम् । गुरु प्रदिष्ट मार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्ग्रसेत् । पुनः प्रत्याहरेच्चैतदुदितं धौतिकर्म तत् ।।  24 ।।   भावार्थ :- धौति के लिए सबसे पहले चार अँगुल चौड़ा ( लगभग तीन से चार इंच ) और पन्द्रह (15) हाथ लम्बा ( लगभग बाईस फीट ) सूती वस्त्र लें । उसे पानी में

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Hatha Pradipika Ch. 2 [24-26]

बस्ति क्रिया   नाभिदध्नजले पायुन्यस्तनालोत्कटासन: । आधाराकुन्चनं कुर्यात् क्षालनं बस्तिकर्म तत् ।। 27 ।।    भावार्थ :- नाभि तक के गहरे पानी में उत्कटासन लगाकर गुदा में नाल अर्थात नली लगाकर अपने मूलाधार का संकोच करें ( अश्वनी मुद्रा का अभ्यास करें ) अर्थात गुदा से पानी को अन्दर की ओर खींचें और गुदा को

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Hatha Pradipika Ch. 2 [27-30]

नेति क्रिया के लाभ   कपालशोधनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी । जत्रूर्ध्वजातरोगौघं नेतिराशु निहन्ति च ।। 31 ।।   भावार्थ :- नेति क्रिया के अभ्यास से पूरे कपाल प्रदेश ( मस्तिष्क ) की शुद्धि होती है, दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है और इसके अतिरिक्त नेति हमारे दाढ़ों अर्थात जबड़े से ऊपर होने वाले सभी रोगों को

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Hatha Pradipika Ch. 2 [31-35]

कपालभाति क्रिया व लाभ   भस्त्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ । कपालभातिर्विख्याता कफदोषविशोषणी ।। 36 ।।   भावार्थ :- लोहार की धौकनी की तरह श्वास को तेज गति के साथ आवाज करते हुए अन्दर व बाहर करना कपालभाति कहलाता है । इसके अभ्यास से सभी प्रकार के कफ दोष नष्ट हो जाते हैं ।   विशेष :-

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Hatha Pradipika Ch. 2 [36-37]

प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति । आचार्याणां तु केषाञ्चिदन्यत् कर्म न संमतम् ।। 38 ।।   भावार्थ :- कुछ योग आचार्यों का मानना है कि प्राणायाम के द्वारा ही शरीर के सभी दोष अथवा विकारों की समाप्ति हो जाती है । अतः षट्कर्म आदि शुद्धि क्रियाओं को करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।  

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Hatha Pradipika Ch. 2 [38-40]

विधिवत् प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते । सुषुम्नावदनं भित्वा सुखाद्विशति मारुत: ।। 41 ।। मारुते मध्यसंचारे मन:स्थैर्यं प्रजायते । यो मन: सुस्थिरीभाव: सैवावस्था मनोन्मनी ।। 42 ।।   भावार्थ :- प्राणायाम को विधिपूर्वक करने से जब हमारा नाड़ी समूह शुद्ध हो जाता है । तब प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी के मुख का भेदन करके उसके अन्दर प्रवेश कर जाता

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Hatha Pradipika Ch. 2 [41-43]