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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [24-26]

अध्याय 2: प्राणायाम

धौति क्रिया

मूल श्लोक · 2.24

चतुरङ्गुलविस्तारं हस्तपञ्चदशायतम् । गुरु प्रदिष्ट मार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्ग्रसेत् । पुनः प्रत्याहरेच्चैतदुदितं धौतिकर्म तत् ।। 24 ।।

भावार्थ

धौति के लिए सबसे पहले चार अँगुल चौड़ा ( लगभग तीन से चार इंच ) और पन्द्रह (15) हाथ लम्बा ( लगभग बाईस फीट ) सूती वस्त्र लें । उसे पानी में डालकर गीला करलें । फिर गुरु द्वारा बताई विधि के अनुसार उस कपड़े को धीरे- धीरे गले से निगलते हुए अपने पेट में ले जाएं । कुछ समय पश्चात धीरे- धीरे उसे वापिस निकाल लें ।

यह प्रक्रिया धौति कर्म कहलाती है । इस धौति क्रिया को वस्त्र धौति के नाम से जाना जाता है ।

धौति क्रिया के लाभ

मूल श्लोक · 2.25

कास - श्वास - प्लीहा - कुष्ठं कफरोगाश्च विंशति: । धौतिकर्मप्रभावेण प्रयान्त्येव न संशय: ।। 25 ।।

भावार्थ

धौति क्रिया के प्रभाव अर्थात अभ्यास से नि:संदेह खाँसी, दमा, तिल्ली व कुष्ठ आदि चर्म रोग व इसके अलावा बीस प्रकार के कफ रोगों का भी नाश होता है ।

विशेष

हठयोग के अनुसार कफ के असन्तुलित होने से से बीस (20) प्रकार के रोग होते हैं ।

गजकरणी क्रिया · उदरगतपदार्थमुद्वमन्ति

मूल श्लोक · 2.26

पवनमपानमुदीर्य कण्ठनाले । क्रमपरिचयवश्यनाडिचक्रा गजकरणीति निगद्यते हठज्ञै: ।। 26 ।।

भावार्थ

योगी को अभ्यास द्वारा क्रमानुसार अपने नाड़ीतन्त्र पर नियंत्रण प्राप्त करके अपानवायु को ऊपर कण्ठ तक लाकर, उसकी सहायता से पेट में स्थित पदार्थों ( बिना पचे हुए अन्न व जल ) को वमन अर्थात बाहर निकालना गजकरणी क्रिया कहलाती है ।

विशेष

यहाँ पर गजकरणी क्रिया का उल्लेख किया गया है । यह भी एक प्रकार की शुद्धि क्रिया है । लेकिन इसे मुख्य शुद्धि क्रियाओं में नहीं रखा गया है । कुछ भाष्यकारों ने इस श्लोक का वर्णन सभी षट्कर्मों के बाद किया है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से आभार।

  4. Sonika

    Thanks sir ji

  5. ranjana chhabra

    sir gajkarni kirya kaise hoti hai