Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 2 [68-70]
अध्याय 2: प्राणायाम
अध्याय परिचय
भ्रामरी प्राणायाम विधि व लाभ
मूल श्लोक · 2.68
वेगाद् घोषं पूरकं भृङ्गनादम् भृङ्गीनादं रेचकं मन्दमन्दम् । योगीन्द्राणामेवमभ्यासयोगात् चित्ते जाता काचिदानन्दलीला ।। 68 ।।
भावार्थ
भ्रमर ( भवरें ) की तरह पूरी तेज गति से गुंजन ( आवाज ) करते हुए श्वास को अन्दर भरें । इसके बाद धीरे- धीरे भ्रमरी ( भंवरी ) की तरह गुंजन करते हुए श्वास को बाहर निकालना भ्रामरी प्राणायाम कहलाता है । इस प्रकार का अभ्यास करने से श्रेष्ठ योगियों के चित्त में एक विशेष प्रकार का आनन्द प्रदान करवाने वाली लीला का अनुभव होता है ।
विशेष
इस श्लोक में भ्रमर शब्द भंवरे के लिए व भ्रमरी शब्द भंवरी के लिए प्रयोग किया गया है ।
मूर्च्छा प्राणायाम विधि व लाभ
मूल श्लोक · 2.69
पूरकान्ते गाढतरं बद्धवा जालन्धरं शनै: । रेचयेन्मूर्च्छनाख्येयं मनोमूर्च्छा सुखप्रदा ।। 69 ।।
भावार्थ
श्वास को अन्दर भरने के बाद मजबूती के साथ जालन्धर बन्ध लगाना चाहिए । इसके बाद धीरे- धीरे श्वास को बाहर निकालने को मूर्च्छा प्राणायाम कहते हैं । मन की यह मनोमूर्च्छा साधक को सुख की अनुभूति करवाने वाली होती है ।
प्लाविनी प्राणायाम विधि व लाभ
मूल श्लोक · 2.70
अन्त:प्रवर्तितोदारमारुतापूरितोदर: । पयस्यगाधेऽपि सुखात् प्लवते पद्मपत्रवत् ।। 70 ।।
भावार्थ
जो साधक पेट के अन्दर ज्यादा से ज्यादा प्राणवायु को भर लेना प्लाविनी प्राणायाम कहलाता है । इसके अभ्यास से साधक गहरे जल ( पानी ) में भी सुखपूर्वक कमल के पत्ते की तरह तैरता रहता है ।
विशेष
प्लाविनी प्राणायाम का लाभ भी परीक्षा की दृष्टि से आवश्यक है । इसके लिए पूछा जाता है कि ऐसा कौन सा प्राणायाम है जिसको करने से साधक गहरे पानी में भी कमल के पत्ते के समान तैरता रहता है ?
या ऐसा कौन सा प्राणायाम है जिसको करने से साधक जल में नहीं डूबता ?
इसका उत्तर प्लाविनी प्राणायाम ही है ।
प्लाविनी प्राणायाम हठप्रदीपिका में वर्णित सभी प्राणायामों ( कुम्भकों ) में अन्तिम कहा गया है । इसी के साथ कुम्भकों का वर्णन समाप्त हुआ ।
धन्यवाद।
Thank you sir
ॐ गुरुदेव*
आपका हृदय से आभार।
Thanku sir????????
Thanku so much sir