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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [4-10]

अध्याय 2: प्राणायाम

मूल श्लोक · 2.4

मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव मध्यग: । कथं स्यादुन्मनीभाव: कार्यसिद्धि: कथं भवेत् ।।

भावार्थ

जब तक हमारी नाड़ियो में मल अर्थात अवशिष्ट पदार्थ भरे होंगे तब तक प्राणवायु मध्यमार्ग अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश नहीं कर सकती । और जब तक प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश नहीं करेगी तब तक उन्मनी भाव ( समाधि ) कैसे प्राप्त होगी ? और मोक्ष रूपी कार्य किस प्रकार से सिद्ध होंगे ?

विशेष

इस श्लोक में नाड़ी शोधन की आवश्यकता को दर्शाया गया है । नाड़ी की शुद्धि का सबसे सरल व प्रभावी उपाय नाड़ी शोधन प्राणायाम ही होता है । जिसका वर्णन अगले श्लोक में किया जाएगा ।

शुद्धिमेति यदा सर्वं नाड़ीचक्रं मलाकुलम्

मूल श्लोक · 2.5

तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षम: ।। 5 ।।

भावार्थ

जब मल से भरी हुई सभी नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं । तभी वह योगी प्राण साधना अर्थात प्राणायाम को करने में सक्षम होता है ।

मूल श्लोक · 2.6

प्राणायामं तत: कुर्यात् नित्यं सात्विकया धिया । यथा सुषुम्नानाड़ीस्था: मला: शुद्धिं प्रयान्ति च ।। 6 ।।

भावार्थ

नाड़ी तन्त्र के शुद्ध हो जाने पर प्रतिदिन सात्विक बुद्धि से प्राणायाम करना चाहिए । जिससे सुषुम्ना नाड़ी में स्थित सभी मलों की शुद्धि हो सके ।

नाड़ी शोधन प्राणायाम विधि

मूल श्लोक · 2.7

बद्ध पद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् । धारयित्वा यथाशक्ति भूय: सूर्येण रेचयेत् ।। 7 ।।

मूल श्लोक · 2.8

प्राणं सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनै: । विधिवत् कुम्भकं कृत्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ।। 8 ।।

मूल श्लोक · 2.9

येन त्यजेत्तेन पीत्वा धारयेदनिरोधत: । रेचयेच्च ततोऽन्येन शनैरेव न वेगत: ।। 9 ।।

भावार्थ

योगी को पद्मासन में बैठकर पहले बायीं नासिका से प्राणवायु को अन्दर भरकर उसे अपनी सामर्थ्य शक्ति के अनुसार अन्दर ही रोकना चाहिए । इसके बाद उस प्राणवायु को दायीं नासिका से बाहर निकाल दें । फिर प्राणवायु को धीरे- धीरे अपनी दायीं नासिका से शरीर के अन्दर पेट तक भर लेना चाहिए । उसके बाद विधिवत रूप से उसे अन्दर रोकते हुए पुनः बायीं नासिका से प्राणवायु को बाहर निकाल दें । इस प्रकार जिस नासिका से श्वास को बाहर निकाला हो उसी से श्वास को अन्दर भरें और उसे तब तक अन्दर ही रोके रखें जब तक की बाहर छोड़ने की संवेदना ( बाहर छोड़ने की इच्छा ) न हो जाए । साथ ही दूसरी नासिका से श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़े, कभी भी जल्दबाजी न करें ।

विशेष

बायीं नासिका से श्वास को अन्दर भरकर उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्दर ही रोककर रखें । फिर श्वास को दायीं नासिका से अन्दर भरकर पुनः यथाशक्ति अन्दर रोके रखें । फिर उसे बायीं नासिका से बाहर निकाल दें । इस प्रकार नाड़ी शोधन का एक चक्र पूरा होता है । श्वास को सदा धीरे- धीरे ही बाहर छोड़ना चाहिए ।

तीन महीने में नाड़ी समूह की शुद्धि

मूल श्लोक · 2.10

प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यया रेचयेत् । पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया ।। सूर्याचन्द्रमसोरनेन विधिनाभ्यासं सदा तन्वतां । शुद्धा नाडिगणा: भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वत: ।। 10 ।।

भावार्थ

जब प्राणवायु को बायीं नासिका से अन्दर भरे तो उसे अन्दर रोकने के बाद दायीं नासिका से बाहर निकाल दें । और इसके बाद दायीं से प्राणवायु को अन्दर लेकर यथासंभव कुम्भक करके पुनः उसे बायीं नासिका से बाहर निकाल देना चाहिए । इस प्रकार जो साधक चन्द्र ( बायीं नासिका ) व सूर्य नाड़ी ( दायीं नासिका ) से नियमित रूप से इसका अभ्यास करते हैं उनका पूरा नाड़ी समूह तीन महीने या कुछ ज्यादा समय में शुद्ध हो जाता है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Anju siwach

    Thank you sir

  3. Rajkumar

    good sir

  4. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से परम आभार।

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Rits

    Thanks sir