Skip to content

Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [17-20]

अध्याय 2: प्राणायाम

वायु कुपित होने से रोगों की उत्पत्ति

मूल श्लोक · 2.17

हिक्का श्वासश्च कासश्च शिर:कर्णाक्षिवेदना: । भवन्ति विविधा: रोगा: पवनस्य प्रकोपत: ।। 17 ।।

भावार्थ

प्राणवायु के कुपित ( असन्तुलन ) होने से हिचकी, दमा, खाँसी, सिर, कान व आँख में पीड़ा तथा विभिन्न प्रकार के अन्य रोग भी होते हैं ।

मूल श्लोक · 2.18

युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत् । युक्तं युक्तं च बध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ।। 18 ।।

भावार्थ

योगी साधक हमेशा प्राणवायु को सही विधि से ही बाहर निकाले, सही विधि से ही अन्दर ले व सही विधि से ही अन्दर रोकना चाहिए । अर्थात साधक को विधिवत रूप से प्राणवायु का रेचन, पूरक व कुम्भक करना चाहिए । इस प्रकार पूर्ण विधि से प्राणायाम करने से साधक को सिद्धि प्राप्त होती है ।

नाड़ी शुद्धि का फल

मूल श्लोक · 2.19

यदा तु नाड़ीशुद्धि: स्यात् तदा चिह्नानि बाह्यत: । कायस्य कृशता कान्तिस्तथा जायेत निश्चतम् ।। 19 ।।

मूल श्लोक · 2.20

यथेष्टधारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् ।। 20 ।।

भावार्थ

जब हम उचित विधि से प्राणायाम का अभ्यास करते हैं तो उसके फलस्वरूप शरीर में कुछ बाह्य लक्षण दिखाई देते हैं । जिससे शरीर निश्चित रूप से पतला व कान्तियुक्त ( चमक वाला ) हो जाता है । इस प्रकार नाड़ी के शुद्ध होने से व प्राणवायु को अपनी इच्छानुसार रोक लेने से जठराग्नि प्रदीप्त अर्थात जाग्रत होती है । अनाहत नामक नाद प्रकट होता है और साधक पूर्ण रूप से आरोग्यता से परिपूर्ण ( स्वस्थ ) हो जाता है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  2. लक्ष्मी नारायण योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिव्दार ।l

    ऊॅ सर जी ।बहुत बढिया तरीके से प्राणवायु को सिध्द करने का उपाय आपने समझाया ।बहुत बहुत धन्यवाद ।

  3. Nisha bhardwaj

    Thanku Sir ????????????

  4. ranjana chhabra

    nice