Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 2 [51-53]
अध्याय 2: प्राणायाम
उज्जायी प्राणायाम
मूल श्लोक · 2.51
मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनै: । यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ।। 51 ।।
भावार्थ
मुख को बन्द करके इड़ा व पिंगला नाडियों ( दोनों नासिकाओं ) से वायु को धीरे- धीरे अन्दर भरें । जब वायु को अन्दर भरें तब गले से लेकर हृदय प्रदेश तक वायु के स्पर्श का अनुभव होना चाहिए ।
विशेष
इस प्राणवायु के दौरान जब हम श्वास को अन्दर लेते हैं तो अपने गले को थोड़ा सिकोड़ लेते हैं । जिसके कारण हम वायु के स्पर्श का अनुभव कर पाते हैं । तभी हमें उज्जायी प्राणायाम करते हुए एक ध्वनि सुनाई पड़ती है । यह ध्वनि गले के साथ स्पर्श करती हुई वायु की ही होती है ।
उज्जायी विधि व लाभ
मूल श्लोक · 2.52
पूर्ववत् कुम्भयेत् प्राणं रेचयेदिडया तत: । श्लेष्मदोषहरं कण्ठे देहानलविवर्धनम् ।। 52 ।।
भावार्थ
पूर्व वर्णित प्राणायाम की भाँति अर्थात सूर्यभेदी की तरह ही कुम्भक करते हुए, श्वास को बायीं नासिका से बाहर निकाल देना ही उज्जायी प्राणायाम कहलाता है । इसके अभ्यास से सभी कफ सम्बन्धी, गले सम्बन्धी रोग दूर होते हैं व जठराग्नि प्रदीप्त ( पाचन तंत्र मजबूत ) होती है ।
उज्जायी के लाभ
मूल श्लोक · 2.53
नाडी जलोदरा धातु गत दोष विनाशनम् । गच्छता तिष्ठता कार्यमुज्जाय्याख्यं तु कुम्भकम् ।। 53 ।।
भावार्थ
इस उज्जायी नामक प्राणायाम के करने से नाड़ियों के दोष, जलोदर अर्थात पेट सम्बन्धी व धातुओं से सम्बंधित रोग नष्ट हो जाते हैं । अतः साधक इस प्राणायाम का अभ्यास चलते- फिरते हुए या स्थिर होकर ( खड़े होकर अथवा बैठकर ) भी कर सकता है ।
विशेष
उज्जायी प्राणायाम की यह अलग से विशेषता है कि हम इसका अभ्यास चलते- फिरते या खड़े होकर भी कर सकते हैं । परीक्षा की दृष्टि से भी यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बनता है कि कौन सा ऐसा प्राणायाम है जिसे हम चलते- फिरते हुए या खड़े होकर भी कर सकते हैं ?
Thanku sir ??
Thanks sir
Thanks for this guidelines
बधाई हो सर, आपके नए क़िताब योगदर्शन प्रकाशित होने जा रहा है…?????
धन्यवाद।
ॐ गुरुदेव*
आपका हृदय से आभार।