Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 2 [27-30]
अध्याय 2: प्राणायाम
बस्ति क्रिया
मूल श्लोक · 2.27
नाभिदध्नजले पायुन्यस्तनालोत्कटासन: । आधाराकुन्चनं कुर्यात् क्षालनं बस्तिकर्म तत् ।। 27 ।।
भावार्थ
नाभि तक के गहरे पानी में उत्कटासन लगाकर गुदा में नाल अर्थात नली लगाकर अपने मूलाधार का संकोच करें ( अश्वनी मुद्रा का अभ्यास करें ) अर्थात गुदा से पानी को अन्दर की ओर खींचें और गुदा को अन्दर से धोये । यह बस्ति क्रिया कहलाती है ।
विशेष
गुदा का आंकुचन ( फैलाना ) व संकुचन ( सिकोड़ना ) करना अश्वनी मुद्रा कहलाती है ।
बस्ति क्रिया के लाभ
मूल श्लोक · 2.28
गुल्म प्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवा: । बस्तिकर्मप्रभावेण क्षीयण्ते सकलामया: ।। 28 ।।
भावार्थ
बस्ति क्रिया के प्रभाव अर्थात अभ्यास से वायुगोला, तिल्ली, जलोदर व वात, पित्त और कफ के असन्तुलन से उत्पन्न होने वाले सभी रोगों का नाश होता है ।
विशेष
वायुगोला का अर्थ है पेट में वायु के प्रकोप से कई बार एक गोलानुमा आकृति का बनना । तिल्ली स्प्लीन को कहते हैं व जलोदर का अर्थ है जल से उत्पन्न होने वाले रोग ।
मूल श्लोक · 2.29
धात्त्विन्द्रियान्त:करणप्रसादं दद्याच कान्तिन्दहनप्रदीप्तिम् । अशेषदोषोपचयं निहन्यादभ्यस्यमानं जलबस्तिकर्म ।। 29 ।।
भावार्थ
जल बस्ति क्रिया से ही शरीर की सभी रस, रक्त, मास, मेद, मज्जा हड्डी व वीर्य आदि सप्त धातु, इन्द्रियाँ, और अन्त:करण निर्मल हो जाते हैं । शरीर में तेजस्विता आती है । पाचन क्रिया मजबूत होती है और साथ ही जल बस्ति से सभी प्रकार के रोग भी समाप्त होते हैं ।
नेति क्रिया
मूल श्लोक · 2.30
सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् । मुखान्निर्गमयेच्चैषा नेति: सिद्धैर्निगद्यते ।। 30 ।।
भावार्थ
पूरी तरह चिकनाई से युक्त एक बारह अँगुल लम्बे सूती धागे को नाक के एक छिद्र से डालकर उसे मुँह द्वारा बाहर निकालने को योगियों ने नेति क्रिया कहा है ।
विशेष
1. सूती धागे पर घी या तेल में अच्छी तरह से लगा होना चाहिए ।
- जो नासिका खुली हुई है पहले उसी नासिका से इसका अभ्यास करें । फिर दूसरी तरफ से
3. इस क्रिया को कागासन में बैठकर करना चाहिए । वैसे खड़े होकर भी इसका अभ्यास किया जा सकता है ।
Thanku sir ??
Thanks sir ji .
धन्यवाद।
Nic sir and thanku?
ॐ गुरुदेव*
आपका बहुत _बहुत आभार