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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [41-43]

अध्याय 2: प्राणायाम

मूल श्लोक · 2.41

विधिवत् प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते । सुषुम्नावदनं भित्वा सुखाद्विशति मारुत: ।। 41 ।।

मूल श्लोक · 2.42

मारुते मध्यसंचारे मन:स्थैर्यं प्रजायते । यो मन: सुस्थिरीभाव: सैवावस्था मनोन्मनी ।। 42 ।।

भावार्थ

प्राणायाम को विधिपूर्वक करने से जब हमारा नाड़ी समूह शुद्ध हो जाता है । तब प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी के मुख का भेदन करके उसके अन्दर प्रवेश कर जाता है । प्राण के सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने से मन में स्थिरता आती है जिससे मन पूरी तरह से स्थिर हो जाता है । मन के इस प्रकार पूरी तरह से स्थिर हो जाने को मनोन्मनी अवस्था या समाधि कहते हैं ।

विशेष

यहाँ पर समाधि को ही मनोन्मनी अवस्था कहा गया है ।

मूल श्लोक · 2.43

तत्सिद्वये विधानज्ञाश्चित्रान्कुर्वन्ति कुम्भकान् । विचित्रकुम्भकाभ्यासाद् विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात् ।। 43 ।।

भावार्थ

अनेक प्रकार के प्राणायामों की विधि को जानने वाले योगी सिद्धि अर्थात समाधि की प्राप्ति के लिए अलग- अलग प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास करते हैं । इस प्रकार अनेक प्रकार के प्राणायाम के करने से साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Raj singh Arya

    Dr. Sab ji se upar ki koi or bhi etiti h kya ji h to hame bhi btao ji ham bhi aapk pass aa jate h ji

    धन्यवाद जी

  3. Sonika

    Thanks sir ji?

  4. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  5. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका बहुत बहुत आभार।

  6. KISHORI VARMA

    Thanks Sir

  7. ranjana chhabra

    sir unmani or manomani main kya fark hai?