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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [44-46]

अध्याय 2: प्राणायाम

आठ प्रकार के कुम्भक ( प्राणायाम )

मूल श्लोक · 2.44

सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतली तथा । भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुम्भका: ।। 44 ।।

भावार्थ

सूर्यभेदी, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्च्छा व प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक अर्थात प्राणायाम कहे गए हैं ।

बन्ध का प्रयोग

मूल श्लोक · 2.45

पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिध: । कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियानक: ।। 45 ।।

भावार्थ

प्राणायाम करते हुए पूरक अर्थात प्राणवायु को शरीर के अन्दर भरने के बाद जालन्धर बन्ध लगाना चाहिए और कुम्भक ( प्राण को रोकने ) के बाद व रेचक ( छोड़ने ) से पहले उड्डीयान बन्ध का प्रयोग करना चाहिए ।

बन्धों का महत्त्व

मूल श्लोक · 2.46

अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते । मध्ये पश्चिमतानेन स्यात् प्राणो ब्रह्मनाडिग: ।। 46 ।।

भावार्थ

कुम्भक ( प्राणायाम ) करते समय गुदा का संकोच रूपी मूलबन्ध करने, गले का संकोच रूपी जालन्धर बन्ध करने व उदर का संकोच रूपी उड्डीयान बन्ध का अभ्यास करने से साधक का प्राण सीधा ब्रह्मनाड़ी अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करता है ।

विशेष

सुषुम्ना नाड़ी को ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Devashree Marathe

    Can you send me these type of valuable information on my e- mail address please ?

  2. pankaj gaikwad

    how is it going now ?

  3. Nisha

    Thanks sir

  4. Divya Amitbhai joshi

    धन्यवाद

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका परम आभार।

  7. Nisha bhardwaj

    Thanku Sir ????????