Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 2 [11-16]
अध्याय 2: प्राणायाम
मूल श्लोक · 2.11
प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीति पर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ।। 11 ।।
भावार्थ
सुबह, दिन के मध्य अर्थात दोहपर में, सायंकाल में तथा आधी रात को इस प्रकार साधक को चार बार में अस्सी ( 80 ) कुम्भकों का अभ्यास करना चाहिए ।
विशेष
इस प्रकार यहाँ पर चार बार कुम्भक का अभ्यास करते हुए कुल अस्सी कुम्भकों को करने की बात कही गई है । इससे पता चलता है कि एक बार में कुल बीस ( 20 ) कुम्भकों का अभ्यास करना चाहिए । तभी चार बार में अस्सी कुम्भक पूरे होंगे ।
साधक के तीन प्रकार
मूल श्लोक · 2.12
कनीयसि भवेत्स्वेद: कम्पो भवति मध्यमे । उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निबन्धयेत् ।। 12 ।।
भावार्थ
कुम्भकों का अभ्यास करते हुए जब साधक के शरीर से पसीना निकलने लगे तो वह साधना की सबसे छोटी अथवा पहली अवस्था होती है । जिस अवस्था में शरीर के अंगों में कम्पन होने लगे वह साधना का दूसरा स्तर अथवा मध्य अवस्था कहलाती है । जैसे ही साधक में साधना की उच्च अवस्था आती है तो उसका शरीर भूमि को छोड़कर ऊपर उठने लगता है । इसे आकाश गमन की सिद्धि भी कहते हैं । अतः इन अवस्थाओं में उन्नति करने के लिए कुम्भक का अभ्यास करें ।
विशेष
यहाँ पर साधक के तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । जिनको निम्न, मध्य व उच्च कोटि के साधकों के नाम से भी जाना जा सकता है ।
पसीने की मालिश का फल
मूल श्लोक · 2.13
जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत् । दृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ।। 13 ।।
भावार्थ
कुम्भक ( प्राणायाम ) रूपी परिश्रम करने से शरीर में पसीना आता है । उस पसीने की शरीर पर मालिश करनी चाहिए । उस पसीने को कभी भी पोछना नहीं चाहिए । ऐसा करने से शरीर मजबूत व हल्का हो जाता है ।
मूल श्लोक · 2.14
अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभोजनम् । ततोऽभ्यासे दृढीभूते न तादृङ्नियमग्रह: ।। 14 ।।
भावार्थ
योग साधना के प्रारम्भ में साधक के लिए घी व दूध से बने भोजन का सेवन करना उत्तम होता है । उसके बाद जब साधक का अभ्यास मजबूत हो जाने पर भोजन के लिए इस प्रकार के नियम का पालन करना आवश्यक नहीं होता है ।
विशेष
योग साधना के शुरुआती दौर में साधक को अपने आहार के प्रति अधिक जागरूक होना चाहिए । इसलिए योग के प्रारम्भ में साधक को पुष्टि व बल प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थ अर्थात घी व दूध आदि का सेवन करना आवश्यक है । इससे शरीर में सामर्थ्यता बढ़ती है ।
मूल श्लोक · 2.15
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्य: शनै: शनै: । तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ।। 15 ।।
भावार्थ
जिस प्रकार शेर, हाथी व बाघ आदि जंगली जानवरों को धीरे- धीरे वश में किया जाता है । ठीक उसी प्रकार प्राणवायु को भी धीरे- धीरे प्रयत्न पूर्वक वश अथवा नियंत्रण में करना चाहिए । इसके विपरीत यदि प्राणवायु को नियंत्रण करने में किसी प्रकार का उतावलापन या जल्दबाजी करने से जीवन की हानि अर्थात मृत्यु भी हो सकती है । अतः प्राणायाम को सदा पूरी सावधानी व यत्नपूर्वक करना चाहिए ।
प्राणायाम में सावधानी
मूल श्लोक · 2.16
प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् । अयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगसमुद्भव: ।। 16 ।।
भावार्थ
उचित विधि से प्राणायाम का अभ्यास करने से सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है । लेकिन विपरीत विधि अथवा गलत तरीके से प्राणायाम का अभ्यास करने से शरीर में सभी प्रकार के रोगों के उत्पन्न होने की भी सम्भावना रहती है ।
विशेष
प्राणायाम का अभ्यास किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए । अन्यथा लाभ की जगह हानि हो सकती है ।
Thanku sir ??
Nice
Thank you sir
अर्थात नाड़ीसोधन प्राणायाम मात्र से मानव मोक्ष प्राप्त कर सकता है???
ॐ गुरुदेव*
आपके पुरुषार्थ को शत_ शत नमन ।
Very nice information
धन्यवाद।
paranam sir