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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 2 [54-58]

अध्याय 2: प्राणायाम

अध्याय परिचय

सीत्कारी प्राणायाम विधि व लाभ

मूल श्लोक · 2.54

सीत्कां कुर्यात्ततथा वक्त्रे घ्राणेनैव विजृम्भिकाम् । एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्वितीयक: ।। 54 ।।

भावार्थ

मुख से सीत्कार अर्थात सी-सी की ध्वनि करते हुए वायु को अन्दर भरें और रेचक अर्थात श्वास को बाहर हमेशा नासिका से ही निकालना चाहिए । इस प्रकार के योग का अभ्यास करने से योगी साधक कामदेव के समान अर्थात देवताओं के समान सुन्दर व मनमोहक हो जाता है ।

उज्जायी की प्रशंसा व लाभ

मूल श्लोक · 2.55

योगिनीचक्रसम्मान्य: सृष्टिसंहारकारक: । न क्षुधा न तृषा निद्रा नैवालस्यं प्रजायते ।। 55 ।।

भावार्थ

यह योगियों द्वारा अत्यंत प्रिय व सम्मानित प्राणायाम है । इसके करने से योगी विश्व का निर्माण व विनाश करने में सक्षम हो जाता है । उसे न ही तो भूख परेशान करती है और न ही प्यास । इसके अलावा उसके अन्दर कभी निद्रा व आलस्य का भाव नहीं आता है ।

मूल श्लोक · 2.56

भवेत् स्वच्छन्ददेहस्तु सर्वोपद्रववर्जित: । अनेन विधिना सत्यं योगिन्द्रों भूमिमण्डले ।। 56 ।।

भावार्थ

इस तरह से सीत्कारी प्राणायाम का अभ्यास करने से योगी स्वच्छ शरीर अर्थात रोग रहित शरीर वाला हो जाता है व सभी प्रकार के उपद्रवों से रहित हो जाता है । इस प्रकार की विधि का पालन करने से वह साधक इस पूरी पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ अथवा विख्यात योगी बन जाता है ।

मूल श्लोक · 2.57

जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत् कुम्भसाधनम् । शनकैर्घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेत् पवनं सुधी: ।। 57 ।।

भावार्थ

बुद्धिमान साधक को चाहिए कि वह जिह्वया अर्थात जीभ के बीच से प्राणवायु को अन्दर भरे । इसके लिए जीभ के दोनों किनारों को अन्दर की ओर मोड़ना पड़ेगा । तभी वायु जीभ के बीच से होकर शरीर के अन्दर प्रवेश करेगी । इसके बाद फिर पहले वाले प्राणायाम की तरह ही कुम्भक ( श्वास को अन्दर रोकने ) को लगाना चाहिए । फिर धीरे-धीरे प्राणवायु को नासिका के दोनों छिद्रों से बाहर निकाल दें । यह शीतली प्राणायाम कहलाता है ।

शीतली प्राणायाम के लाभ

मूल श्लोक · 2.58

गुल्मप्लीहादिकान् रोगान् ज्वरं पित्तं क्षुधां तृषाम् । विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ।। 58 ।।

भावार्थ

शीतली नामक प्राणायाम के करने से साधक के सभी वायु विकार, तिल्ली का बढ़ना, बुखार, सभी पित्त सम्बन्धी दोषों को समाप्त कर देता है । भूख व प्यास की व्याकुलता को कम करता है और साथ ही शरीर में बनने वाले जहर के प्रभाव को भी समाप्त कर देता है ।

विशेष

हठयोग के आसन, प्राणायाम व मुद्रा आदि के लाभों में आपको विष शब्द का प्रयोग बहुत बार मिलेगा । इस विष शब्द का अर्थ यहाँ पर सामान्य जहर बिलकुल भी नहीं है । कई विद्यार्थी इसे सामान्य जहर समझने की भूल कर लेते हैं । लेकिन यहाँ पर कहे गए विष शब्द का अर्थ विजातीय तत्त्वों से है । हमारे शरीर में गलत आहार ग्रहण करने से, ज्यादा आहार ग्रहण करने से या फिर ग्रहण किए गए आहार के न पचने से शरीर में कुछ ऐसे विषैले तत्त्व बन जाते हैं जो शरीर को हानि पहुँचाने का काम करते हैं । यहाँ पर उसी विष का वर्णन बार- बार किया गया है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Devashree Marathe

    आचार्य जी प्रणाम. बहोतही बढीया तरिका topic समझाने का. Om Shanti.

  2. Nisha bhardwaj

    Dhyanwad guru ji????????

  3. लक्ष्मी नारायण योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिव्दार ।l

    ऊॅ सर जी !बहुय अच्छी जानकारी मिल रही है ।

    धन्यवाद ।

  4. Neelam

    Very useful information,thank you sir

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Sandeep

    आचार्य जी, श्लोक २/५५ में यहाँ उज्जयी प्राणायाम की प्रसंशा व लाभ लिखा है, क्या यह सही है या “सीतकारी प्राणायाम के लाभ व प्रसंशा” होना चाहिए?