नेति क्रिया के लाभ   कपालशोधनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी । जत्रूर्ध्वजातरोगौघं नेतिराशु निहन्ति च ।। 31 ।।   भावार्थ :- नेति क्रिया के अभ्यास से पूरे कपाल प्रदेश ( मस्तिष्क ) की शुद्धि होती है, दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है और इसके अतिरिक्त नेति हमारे दाढ़ों अर्थात जबड़े से ऊपर होने वाले सभी रोगों को

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Hatha Pradipika Ch. 2 [31-35]

कपालभाति क्रिया व लाभ   भस्त्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ । कपालभातिर्विख्याता कफदोषविशोषणी ।। 36 ।।   भावार्थ :- लोहार की धौकनी की तरह श्वास को तेज गति के साथ आवाज करते हुए अन्दर व बाहर करना कपालभाति कहलाता है । इसके अभ्यास से सभी प्रकार के कफ दोष नष्ट हो जाते हैं ।   विशेष :-

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Hatha Pradipika Ch. 2 [36-37]

प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति । आचार्याणां तु केषाञ्चिदन्यत् कर्म न संमतम् ।। 38 ।।   भावार्थ :- कुछ योग आचार्यों का मानना है कि प्राणायाम के द्वारा ही शरीर के सभी दोष अथवा विकारों की समाप्ति हो जाती है । अतः षट्कर्म आदि शुद्धि क्रियाओं को करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।  

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Hatha Pradipika Ch. 2 [38-40]

विधिवत् प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते । सुषुम्नावदनं भित्वा सुखाद्विशति मारुत: ।। 41 ।। मारुते मध्यसंचारे मन:स्थैर्यं प्रजायते । यो मन: सुस्थिरीभाव: सैवावस्था मनोन्मनी ।। 42 ।।   भावार्थ :- प्राणायाम को विधिपूर्वक करने से जब हमारा नाड़ी समूह शुद्ध हो जाता है । तब प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी के मुख का भेदन करके उसके अन्दर प्रवेश कर जाता

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Hatha Pradipika Ch. 2 [41-43]

आठ प्रकार के कुम्भक ( प्राणायाम )   सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतली तथा । भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुम्भका: ।। 44 ।।   भावार्थ :- सूर्यभेदी, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्च्छा व प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक अर्थात प्राणायाम कहे गए हैं ।   बन्ध का प्रयोग   पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिध: । कुम्भकान्ते

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Hatha Pradipika Ch. 2 [44-46]

प्राण व अपान की साधना का फल   अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कण्ठादधो नयेत् । योगी जराविमुक्त: सन् षोडशाब्दवया भवेत् ।। 47 ।।   भावार्थ :- अपान वायु ( नीचे की वायु ) को ऊपर उठाकर और प्राण वायु को कण्ठ प्रदेश से नीचे की ओर ले जाने की साधना करने से बूढ़ा व्यक्ति भी अपने बुढ़ापे

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Hatha Pradipika Ch. 2 [47-50]

उज्जायी प्राणायाम   मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनै: । यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ।। 51 ।।   भावार्थ :- मुख को बन्द करके इड़ा व पिंगला नाडियों ( दोनों नासिकाओं ) से वायु को धीरे- धीरे अन्दर भरें । जब वायु को अन्दर भरें तब गले से लेकर हृदय प्रदेश तक वायु के स्पर्श

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Hatha Pradipika Ch. 2 [51-53]