बहिरकल्पितावृत्तिर्महाविदेहा तत: प्रकाशावरणक्षय: ।। 43 ।।   शब्दार्थ :- बहिरकल्पिता ( शरीर के साथ सम्बन्ध रहते हुए बाहर के ) वृत्ति: ( पदार्थों में वृत्ति अर्थात व्यापार का होना ) महाविदेहा ( महाविदेहा नामक धारणा है ) तत: ( उसके द्वारा ) प्रकाश ( प्रकाश अर्थात ज्ञान पर पड़ा ) आवरण ( पर्दा ) क्षय:

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Yoga Sutra 3 – 43

स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजय: ।। 44 ।।   शब्दार्थ :- स्थूल ( जिसका कोई आकार हो या कोई ठोस पदार्थ ) स्वरूप ( लक्षण या उनकी विशेषता ) सूक्ष्म ( जिसे ठोस रूप में या प्रत्यक्ष रूप से न देखा जाए ) अन्वय ( अति सूक्ष्म या उत्पत्ति का आधार ) अर्थवत्त्व ( उद्देश्य या प्रयोजन )

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Yoga Sutra 3 – 44

ततोऽणिमादिप्रादुर्भाव: कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ।। 45 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उस अर्थात उन भूतों पर विजय प्राप्त करने पर ) अणिमादि ( अणिमा आदि सिद्धियाँ ) प्रादुर्भाव: ( प्रकट होती हैं ) काय ( शरीर )  सम्पत् ( सामर्थ्यवान अर्थात बलवान होता है ) च ( और ) तद्- धर्म ( तब उन भूतों के

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Yoga Sutra 3 – 45

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ।। 46 ।।   शब्दार्थ :- रूप ( सुन्दर ) लावण्य ( चमक युक्त या तेजस्वी ) बल ( बलवान अर्थात मजबूत मांशपेशियों वाला ) वज्र ( पत्थर की भाँति मजबूत या कठोर ) संहननत्वानि ( के समान संयुक्त या संगठित होना ) कायसम्पत् ( शरीर की सम्पदा अर्थात सम्पत्ति है )  

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Yoga Sutra 3 – 46

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् इन्द्रियजय: ।। 47 ।।   शब्दार्थ :- ग्रहण ( किसी को अनुभूत या महसूस करना ) स्वरूप ( कार्य या लक्षण ) अस्मिता ( सूक्ष्म अवस्था ) अन्वय ( सत्त्व, रज व तम से निर्मित सूक्ष्मतर अवस्था ) अर्थवत्त्व ( उद्देश्य अथवा प्रयोजन ) संयमाद् ( संयम करने से ) इन्द्रिय ( इन्द्रियों पर

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Yoga Sutra 3 – 47

ततो मनोजवित्वं विकरण भाव: प्रधानजयश्च ।। 48 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उस अर्थात उस इन्द्रियों को जीतने से ) मनोजवित्वं ( शरीर की गति मन की भाँति होती है ) विकरणभाव: ( बिना शरीर के कहीं भी इन्द्रियों से कार्य करना ) च ( और ) प्रधानजय: ( प्रकृति से बने सभी भेदों

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Yoga Sutra 3 – 48

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ।। 49 ।।     शब्दार्थ :- सत्त्व ( बुद्धि ) पुरुष ( पुरुष अर्थात जीवात्मा को ) अन्यता ( अलग- अलग ) ख्यातिमात्रस्य ( जानने या मानने वाले का ) सर्व ( सभी ) भाव ( पदार्थों पर ) अधिष्ठातृत्वम् ( अधिकार प्राप्त हो जाता है ) च ( और

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Yoga Sutra 3 – 49