तत: प्रातिभश्रावणवेदनादर्शा स्वादवार्ता जायन्ते  ।। 36 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उससे अर्थात उस संयम से ) प्रातिभ ( दूर व छिपी हुई वस्तुओं का ज्ञान ) श्रावण ( दिव्य श्रवण ) वेदन ( दिव्य स्पर्श ) आदर्श ( दिव्य दर्शन ) आस्वाद ( दिव्य स्वाद ) वार्ता ( दिव्य गन्ध ) जायन्ते (

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Yoga Sutra 3 – 36

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ।। 37 ।।   शब्दार्थ :- ते ( वे ) समाधौ ( समाधि में ) उपसर्गा: ( विध्न अर्थात बाधक हैं और ) व्युत्थाने ( व्युत्थान काल अर्थात भौतिक जीवन में ) सिद्धयः ( सिद्धियाँ हैं )    सूत्रार्थ :- वे ( प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता ) छ:

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Yoga Sutra 3 – 37

बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेश: ।। 38 ।।   शब्दार्थ :- बन्ध ( बन्धन या रुकने ) कारण ( के कारण ) शैथिल्यात ( स्थिलता से ) प्रचार संवेदनात् ( उसके आने- जाने की गति की जानकारी हो जाती है जिससे ) चित्तस्य ( चित्त का ) पर ( दूसरे के ) शरीर ( शरीर में )

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Yoga Sutra 3 – 38

उदानजयाज्जलपङ्क कण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ।। 39 ।।   शब्दार्थ :- उदान ( उदान नामक प्राण के ) जयात् ( जीतने से ) जल ( पानी ) पङक ( कीचड़ ) कण्टक ( काँटें ) आदिषु ( इत्यादि ) असङ्ग ( से रहित हो जाता है) च ( और ) उत्क्रान्ति: ( वह उच्च या ऊर्ध्व गति

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Yoga Sutra 3 – 39

समानजयाज्ज्वलनम् ।। 40 ।।   शब्दार्थ :- समान ( समान नामक प्राण के ) जयात् ( जीतने से ) ज्वलनम् ( तेजस्विता आती है )   सूत्रार्थ :- समान नामक प्राण पर विजय प्राप्त करने के बाद योगी के शरीर में तेजस्विता आ जाती है ।   व्याख्या :- इस सूत्र में समान नामक प्राण

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Yoga Sutra 3 – 40

श्रोत्राकाशयो: सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ।। 17 ।।   शब्दार्थ :- श्रोत्र ( कान और ) आकाशयो: ( आकाश ) सम्बन्ध ( दोनों के आपसी सम्बन्ध में ) संयमात् ( संयम करने से ) श्रोत्रम् ( दोनों कानों में )      दिव्यं ( दिव्यता अर्थात सूक्ष्म शब्दों को सुनने की क्षमता आती है )     सूत्रार्थ

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Yoga Sutra 3 – 41

कायाकाशयो: सम्बन्ध संयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ।। 18 ।।   शब्दार्थ :- काय ( शरीर व ) आकाशयो: ( आकाश के ) सम्बन्ध ( आपसी सम्बन्ध में ) संयमात् ( संयम करने से ) च ( और ) लघु ( छोटे अथवा हल्के ) तूल ( रुई आदि पदार्थों या वस्तुओं में संयम करने से ) समापत्ते: (

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Yoga Sutra 3 – 42