स्वधर्म की उपयोगिता   स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 31 ।।   व्याख्या :-  इसलिए अपने स्वधर्म ( स्वाभाविक कर्म ) को ध्यान में रखते हुए इस विपरीत परिस्थिति में तुम्हे विचलित नहीं होना चाहिए । क्योंकि एक क्षत्रिय व्यक्ति के लिए युद्ध से बड़ा और कोई धर्म अथवा कल्याणकारी

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [31-35]

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ॥ 36 ।।   व्याख्या :-  इस प्रकार तेरे सभी शत्रु तुम्हारी योग्यता की निन्दा अर्थात् बुराई करते हुए तुम्हें अनेकों ऐसी बातें कहेंगे, जोकि कहने योग्य नहीं हैं । तुम्हारी योग्यता की निन्दा से अधिक दु:खदायक तुम्हारे लिए और क्या हो सकता है

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [36-40]

बुद्धि के भेद   व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌ ॥ 41 ।।   व्याख्या :-  हे कुरुनन्दन अर्जुन ! निष्काम कर्मयोग करने वालों की बुद्धि निश्चित रूप से एक ही होती है । जबकि इसके विपरीत सकाम कर्म वाले व्यक्तियों की बुद्धि अनेक प्रकार की होती है । कामनाएँ अनेक प्रकार की होने

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [41-44]

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌ ॥ 45 ।।     व्याख्या :-  हे अर्जुन ! वेदों में त्रिगुणों ( सत्त्व, रज व तम ) के विषय अर्थात् इन गुणों से प्राप्त होने वाले फलों के बारे में बताया गया है । तुम इन तीनों गुणों से मुक्त ( रहित ) हो

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [45-47]

योग की परिभाषा ( समत्वं योग )   योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 48 ।।   व्याख्या :-  हे धनंजय ! तुम योग में पूरी तरह से स्थित होकर ( अपने चित्त को सम अवस्था में रखकर ) फल की इच्छा को त्यागकर कार्य की सिद्धि

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [48-49]

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌ ।। 50 ।।   व्याख्या :-  जो व्यक्ति समबुद्धि से युक्त होकर कार्य करता है । वह इस संसार में सभी पाप व पुण्य कर्मों से रहित हो जाता है । इसलिए हमें समबुद्धि का सहारा लेकर ही सभी कार्य करने चाहिए । इस प्रकार

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [50]

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌ ।। 51 ।।     व्याख्या :-  समबुद्धि से युक्त मनीषी अथवा ऋषिगण प्रत्येक कर्म ( कार्य ) को फल की आसक्ति ( इच्छा ) से रहित होकर करते हैं । जिससे वह जन्म- मरण के बन्धन व दुःखों अथवा शोक से पूरी तरह मुक्ति

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Bhagwad Geeta Ch. 2 [51-53]