दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य  वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्   ।। 15 ।।   शब्दार्थ :- दृष्ट , ( देखे हुए ) आनुश्रविक , ( सुने हुए ) विषय , ( उपभोग की वस्तुओं को )  वितृष्णस्य, ( प्राप्त करने की इच्छा न होना ही ) वशीकार – संज्ञा,  ( पूर्ण नियंत्रण की अवस्था को ही ) वैराग्यम् ( राग का अभाव या

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Yoga Sutra – 15

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्  ।। 16 ।।   शब्दार्थ :- पुरुषख्याते: ( पुरूष के ज्ञान द्वारा ) गुणवैतृष्ण्यम् ( प्रकृति के गुणों में तृष्णा अर्थात लालसा का पूर्ण रूप से अभाव हो जाना ) तत्  ( वह ) परम्  ( पर अर्थात सबसे ऊँचा वैराग्य  है । )   सूत्रार्थ :-  जब पुरुष को आत्मज्ञान  हो जाता

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Yoga Sutra – 16

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्सम्प्रज्ञात:  ।। 17 ।।   शब्दार्थ :-  वितर्क  ( स्थूलभूत का साक्षात्कार) विचार  ( सूक्ष्मभूत का साक्षात्कार ) आनन्द  ( सुख का साक्षात्कार ) अस्मिता  ( जीवात्मा का साक्षात्कार ) रूपानुगमात्  ( इनके सम्बन्ध से ) सम्प्रज्ञात  ( सम्प्रज्ञात समाधि होती है )   सूत्रार्थ :-  समाधि  के वितर्कानुगत,  विचारानुगत,  आन्नदानुगत, और अस्मितानुगत  नामक भेदों

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Yoga Sutra – 17

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्व: संस्कारशेषोऽन्य: ।। 18 ।।   शब्दार्थ :- विराम, ( सभी वृत्तियों के रुकने का ) प्रत्यय, ( जो कारण अर्थात पर वैराग्य है ) अभ्यास पूर्व : , ( उसके बार – बार अभ्यास या प्रयास करने से ) संस्कार शेष:, ( चित्त के संस्कार नाममात्र ही बचते हैं । ) अन्य, ( ऐसी

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Yoga Sutra – 18

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ।। 19 ।।   शब्दार्थ :- भव ( संसार ) प्रत्यय ( यथार्थ ज्ञान / कारण ) विदेह ( शरीर रहित ) प्रकृतिलयानाम् ( मूल प्रकृति को जानने वाले नाम के योगी )   सूत्रार्थ :-  संसार का यथार्थ ज्ञान  अर्थात सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, आकाश, सुख – दुःख का विवेकपूर्ण चिंतन  करने से

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Yoga Sutra – 19

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ।। 20 ।।   शब्दार्थ :- श्रद्धा, ( रुचि, विश्वास ) वीर्य, ( उत्साह, पुरुषार्थ )  स्मृति, ( पूर्व में अनुभव किए गए संस्कार ) समाधि, ( चित्त की एकाग्रता ) प्रज्ञा, ( बुद्धि की उन्नत अवस्था ) पूर्वक, ( क्रमानुसार ) इतरेषाम्, ( अन्यों से भिन्न  समाधि की अवस्था होती है )

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Yoga Sutra – 20

तीव्रसंवेगानामासन्न: ।। 21 ।।   शब्दार्थ :- तीव्र, ( तेज ) संवेगानाम्, ( साधन ) आसन्न:, ( समीप या पास में होना )   सूत्रार्थ :- जिन योगियों के अभ्यास  और वैराग्य  की गति अत्यंत तेज  या ऊँची होती है । उन्हें उतनी ही जल्दी समाधि व समाधि के फल की प्राप्ति होती है ।

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Yoga Sutra – 21