विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्  ।। 8 ।।   शब्दार्थ :- अतद्रुपप्रतिष्ठम् , ( जो उस पदार्थ या वस्तु के स्वरूप में प्रतिष्ठित नही है। ) मिथ्याज्ञान , ( झूठी या  गलत जानकारी ) विपर्यय  ( विपरीत, उल्टा ) है।   सूत्रार्थ :- विपर्यय वृत्ति एक ऐसा झूठा  या गलत ज्ञान है, जो कि वहाँ उस पदार्थ या

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Yoga Sutra – 8

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुुशून्यो विकल्प: ।। 9 ।।   शब्दार्थ :-  शब्दज्ञानानुपाती , ( शब्द ज्ञान से उत्पन्न होने वाला ) वस्तुशून्य , ( जो वस्तु से रहित हो ) विकल्प:  ( विपरीत कल्पना करना )   सूत्रार्थ :- शब्द के आधार पर जो ज्ञान उत्पन्न  होता है, लेकिन जो ( पदार्थ या वस्तु ) वास्तव में

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Yoga Sutra – 9

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ।। 10 ।।   शब्दार्थ :- अभाव, ( वंचित होना ) प्रत्यय, ( ज्ञान का ) अवलम्बन, ( ग्रहण करने वाली ) वृत्ति, ( व्यापार ) निद्रा  ( जाग्रत और स्वप्न्न  से रहित अवस्था )   सूत्रार्थ :- शरीर की जाग्रत  और स्वप्न्न   अवस्थाओं के ज्ञान  से रहित  जो स्थिति होती है। वह

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Yoga Sutra – 10

अनुभूतविषयासम्प्रमोष: स्मृति: ।। 11 ।।   शब्दार्थ :- अनुभूत, ( पहले से अनुभव या महसूस किए गए ) विषय, ( घटनाक्रम का  ) असम्प्रमोष: , ( दोबारा से स्मरण या याद आना ) स्मृति  ( स्मरण शक्ति या याददाश्त ) है।   सूत्रार्थ :- पहले से अनुभव की गई घटनाओं का दोबारा से याद  आ

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Yoga Sutra – 11

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध: ।। 12 ।।   शब्दार्थ :- अभ्यास, ( प्रयत्न या कोशिश करना ) वैराग्याभ्याम् , ( राग रहित, तृष्णा रहित स्थिति के द्वारा ) तन्निरोध:  ( उन सबको रोकना, अवरोध करना ) सूत्रार्थ :- अभ्यास  और वैराग्य  के द्वारा उन सभी वृत्तियों का निरोध  होता है ।   व्याख्या :- इस सूत्र में

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Yoga Sutra – 12

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास: ।। 13 ।।   शब्दार्थ :- तत्र,  ( वहाँ )  स्थितौ, ( स्थिरता के लिए ) यत्न, (किया गया प्रयास) अभ्यास ( अभ्यास ) है।   सूत्रार्थ :- वहाँ उन दोनों ( अभ्यास और वैराग्य ) में से चित्त  की स्थिरता  हेतु किए गए प्रयास  या प्रयत्न  को अभ्यास  कहते हैं ।

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Yoga Sutra – 13

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो   दृढभूमि : ।। 14 ।।   शब्दार्थ :-  तु , ( लेकिन ) स , ( वह अभ्यास ) दीर्घकाल , ( लम्बे समय तक ) नैरन्तर्य , ( बिना किसी रुकावट के अर्थात लगातार ) सत्कार , ( आदरपूर्वक ) आसेवित: ,  ( सेवन किए जाने पर ) दृढ , (

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Yoga Sutra – 14