आसन प्रारम्भ   स्वस्तिकासन  जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकाय: समासीन: स्वस्तिकं तत् प्रचक्षते ।। 21 ।।   भावार्थ :- दोनों पैरों के तलवों ( पैर के सबसे नीचे का भाग ) को एक दूसरे पैर अर्थात बायें पैर के तलवे को दायीं पिण्डली व जांघ के बीच में और दायें पैर के तलवे को बायें

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Hatha Pradipika Ch. 1 [21-27]

मत्स्येंद्र आसन    वामोरुमूलार्पित दक्षपादं जानोर्बहिर्वेष्टितवामपादम् । प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्तिताङ्ग: श्री मत्स्यनाथोदितमासनं स्यात् ।। 28 ।।   भावार्थ :- बायीं जंघा के मूल भाग ( बीच में ) पर दायें पैर को रखें । अब अपने बायें पैर को अपने दाहिने पैर के घुटने के पास रखते हुए घुटने ( बायें ) को सीधा रखें ।

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Hatha Pradipika Ch. 1 [28-30]

पश्चिमतान आसन का लाभ  इति पश्चिमतान मासनाग्र्यं पवनं पश्चिमवाहिनं करोति । उदरं जठरानलस्य कुर्यादुदरे काश्यमरोगतां च पुंसाम् ।। 31 ।।   भावार्थ :- इन सभी आसनों ( इससे पूर्व में जिन आसनों का वर्णन किया गया है ) में पश्चिमत्तान आसन सबसे अग्रणीय या मुख्य आसन है । इसके अभ्यास से साधक का प्राण मेरुदण्ड

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Hatha Pradipika Ch. 1 [31-34]

प्रमुख चार आसन  चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि वै । तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम् ।। 35 ।।   भावार्थ :- भगवान शिव ने कुल चौरासी ( 84 ) आसनों का वर्णन किया है । यहाँ पर मैं उन सभी आसनों के सार कहे जाने वाले मुख्य चार आसनों का वर्णन कर रहा हूँ ।   विशेष :- यहाँ

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Hatha Pradipika Ch. 1 [35-36]

सिद्धासन की विधि  योनिस्थानकमन्ध्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेत् मेढ्रे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम् । स्थाणु: संयमितेन्द्रियोऽचलदृशापश्येद् भ्रुवोरन्तरम् ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। 37 ।।   भावार्थ :- एक पैर की एड़ी को योनिस्थान में ( अण्डकोषों के ठीक नीचे वाले भाग में ) लगाकर दूसरे पैर को शिश्न  के ( लिंग ) ऊपर मजबूती से रखें

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Hatha Pradipika Ch. 1 [37-40]

सिद्धासन से बहतर हजार ( 72000 ) नाड़ियों की शुद्धि चतुरशीतिपीठेषु सिद्धमेव सदाभ्यसेत् । द्वासप्ततिसहस्त्राणां नाड़ीनां मलशोधनम् ।। 41 ।।   भावार्थ :- उन चौरासी आसनों में से साधक को सदा सिद्धासन का ही अभ्यास करना चाहिए । इसके अभ्यास से शरीर में स्थित सभी बहतर हजार ( 72000 ) नाड़ियों के मल की शुद्धि

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Hatha Pradipika Ch. 1 [41-45]

पद्मासन की विधि  वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि, पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् । अङ्गुष्ठौ, हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेत् एतद्व्याधिविनाशकारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते ।। 46 ।।   भावार्थ :- बायीं जंघा पर दायें पैर को व दायीं जंघा पर बायें पैर को रखें । अब दोनों हाथों को कमर के पीछे से

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Hatha Pradipika Ch. 1 [46-50]