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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 1 [28-30]

अध्याय 1: आसन

मत्स्येंद्र आसन

मूल श्लोक · 1.28

वामोरुमूलार्पित दक्षपादं जानोर्बहिर्वेष्टितवामपादम् । प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्तिताङ्ग: श्री मत्स्यनाथोदितमासनं स्यात् ।। 28 ।।

भावार्थ

बायीं जंघा के मूल भाग ( बीच में ) पर दायें पैर को रखें । अब अपने बायें पैर को अपने दाहिने पैर के घुटने के पास रखते हुए घुटने ( बायें ) को सीधा रखें । इसके बाद बायें हाथ को घुमाते हुए बायें पैर के पंजे को ही पकड़े । शरीर को पूरी तरह से घुमाते हुए दाहिने हाथ को पीछे दायीं ओर ही ले जाएं । यह श्री मत्स्येंद्रनाथ द्वारा बताया गया मत्स्येंद्र आसन है ।

मत्स्येंद्र आसन के लाभ

मूल श्लोक · 1.29

मत्स्येंद्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचण्डरुग्मण्डलखण्डनास्त्रम् । अभ्यासत: कुण्डलिनीप्रबोधं चन्द्र स्थिरत्वं च ददाति पुंसाम् ।। 29 ।।

भावार्थ

मत्स्येंद्र आसन का अभ्यास करने से अभ्यासी साधकों की जठराग्नि ( पाचन तंत्र ) प्रदीप्त ( मजबूत या तेज ) होती है । जो रोगों के समूह या सभी रोगों को खत्म करने के लिए एक अस्त्र की तरह काम करती है । जिस प्रकार हम अस्त्र से अपने शत्रु को खत्म करते हैं । ठीक उसी प्रकार प्रदीप्त हुई जठराग्नि रोगों के पूरे समूह को नष्ट करने का काम करती है । साथ ही इसके अभ्यास से कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत होती है और चंद्रमण्डल से निकलने वाला रस भी लगातार प्रवाहित होते हुए शरीर में ही स्थिर होता है । अर्थात नष्ट नहीं होता ।

पश्चिमतान आसन

मूल श्लोक · 1.30

प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ दोर्भ्यां पदाग्रद्वितयं गृहीत्वा । जानूपरिन्यस्तललाटदेशो वसेदिदं पश्चिमतानमाहु: ।। 30 ।।

भावार्थ

अपने दोनों पैरों को भूमि पर अपने सामने की ओर डण्डे के समान फैलाकर दोनों पैरों के पंजों को पकड़े । इसके बाद अपने माथे को घुटनों से आगे ( जहाँ तक सम्भव हो ) लेकर जाएं और वहीं पर उसे स्थिर कर दें । इस विधि को ही पश्चिमतान अथवा पश्चिमोत्तान आसन कहते हैं ।

विशेष

बहुत सारे योग शिक्षकों का मानना है कि हमारा माथा घुटनों के ऊपर लगना चाहिए । लेकिन यह बात पूरी तरह से अवैज्ञानिक है । क्योंकि यदि हम अपने माथे को घुटनों से लगाने का प्रयास करेंगे तो हमारी कमर का ऊपरी हिस्सा ऊपर की ओर उठा रह जाएगा । जिससे हमारा पेट हमारी जंघाओं से नही लग पाएगा और ऐसा न होने की स्थिति में एक तो हम इस आसन का पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और दूसरा हमारी कमर की आकृति बिगड़ जाएगी । इसलिए हमारा माथा घुटनों की बजाय घुटनों से आगे जाना चाहिए । घुटनों पर हमारी छाती आनी चाहिए । यह पश्चिमोत्तान आसन की पूर्ण वैज्ञानिक विधि है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से आभार।

  4. Anshu

    प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर वण॔न! धन्यवाद! ओम