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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 1 [41-45]

अध्याय 1: आसन

अध्याय परिचय

सिद्धासन से बहतर हजार

( 72000 ) नाड़ियों की शुद्धि

मूल श्लोक · 1.41

चतुरशीतिपीठेषु सिद्धमेव सदाभ्यसेत् । द्वासप्ततिसहस्त्राणां नाड़ीनां मलशोधनम् ।। 41 ।।

भावार्थ

उन चौरासी आसनों में से साधक को सदा सिद्धासन का ही अभ्यास करना चाहिए । इसके अभ्यास से शरीर में स्थित सभी बहतर हजार ( 72000 ) नाड़ियों के मल की शुद्धि हो जाती है ।

विशेष

इस श्लोक से हमें यह पता चलता है कि स्वामी स्वात्माराम ने हठप्रदीपिका में नाडियों की कुल संख्या बहतर हजार ( 72000 ) मानी है ।

बारह ( 12 ) वर्षों में सिद्धासन की सिद्धि

मूल श्लोक · 1.42

आत्मध्यायी मिताहारी यावद् द्वादशवत्सरसम् । सदा सिद्धासनाभ्यासाद्योगी निष्पत्तिमाप्नुयात् । किमन्यैर्बहुभि: पीठै: सिद्धे सिद्धासने सति ।। 42 ।।

भावार्थ

आत्मा का अध्ययन अथवा चिन्तन करने वाला, मिताहार ( आहार में संयम ) करने वाला योगी साधक निरन्तर बारह ( 12 ) वर्षों तक सिद्धासन का अभ्यास करता है । वह निष्पत्ति अवस्था अर्थात मोक्ष या योग में सिद्धि को प्राप्त कर लेता है । जिसने सिद्धासन का अभ्यास कर लिया हो, उसे अन्य भिन्न- भिन्न प्रकार के आसन करने की क्या आवश्यकता है ?

मूल श्लोक · 1.43

प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुम्भके । उत्पद्यते निरायासात् स्वयमेवोन्मनी कला ।। 43 ।।

भावार्थ

प्राणवायु के नियंत्रित होने पर साधक का केवल कुम्भक सिद्ध हो जाता है । जिससे बिना किसी प्रयास के अर्थात अपने आप ही उन्ममी कला ( समाधि )  की प्राप्ति हो जाती है ।

विशेष

यहाँ पर उन्मनी कला का अर्थ समाधि है ।

तीनों बन्धों का एकसाथ लगना

मूल श्लोक · 1.44

तथैकस्मिन्नेव दृढे बद्धे सिद्धासने सदा । बन्धत्रयमनायासात् स्वयमेवोपजायते ।। 44 ।।

भावार्थ

इस प्रकार जब सिद्धासन दृढ़तापूर्वक सिद्ध हो जाता है । तब साधक के तीनों बन्ध ( जालन्धर बन्ध, उड्डियान बन्ध व मूलबन्ध ) बिना किसी विशेष प्रयास के अपने आप ही लग जाते हैं ।

श्रेष्ठ आसन, प्राणायाम, मुद्रा व नाद

मूल श्लोक · 1.45

नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भ: केवलोपम: । न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लय: ।। 45 ।।

भावार्थ

सिद्धासन के तुल्य ( समान ) अन्य कोई आसन नहीं है । केवल कुम्भक के समान कोई अन्य कुम्भक अर्थात प्राणायाम नहीं है । खेचरी मुद्रा के समान अन्य कोई मुद्रा नहीं है । तथा नाद के समान अन्य कोई लय नहीं है ।

विशेष

इस श्लोक में स्वामी स्वात्माराम ने योग के चार अंगों में से कौन- कौन श्रेष्ठ है ? इसकी चर्चा करते हुए सभी आसनों में से सिद्धासन को, सभी कुम्भको में से केवल कुम्भक को, सभी मुद्राओं में से खेचरी को, व सभी प्रकार के नादों में से लययोग को श्रेष्ठ बताया है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! बहुत ही सुंदर व्याख्या है! आपका बहुत बहुत धन्यवाद! ओम ?

  3. Mamta

    Thanks again sir

  4. Dinesh Kumar

    गुरु जी आपका मार्गदशन सर्वश्रष्ठ है।

  5. Neelam

    Very good information , thank you sir

  6. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    हम सबको निरंतर योग रस का पान कराने हेतु आपका

    हृदय से आभार।

  7. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।