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  • Hatha Pradipika Ch. 1 [5 – 10]

नाथ योगियों का परिचय

श्री आदिनाथमत्स्येन्द्रशाबरानन्दभैरवा: ।

चौरङ्गीमीनगोरक्षविरुपाक्षविलेशय: ।। 5 ।।

 

भावार्थ :- श्री आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, शाबर, आनंदभैरव, चौरङ्गी, मीन, गोरक्ष, विरुपाक्ष, विलेशय ।

 

मन्थानो भैरवो योगी सिद्धिबुद्घश्च कन्थडि: ।

कोरण्टक: सुरानन्द: सिद्धिपादश्च चर्पटि: ।। 6 ।।

 

भावार्थ :- मन्थान, भैरव योगी, सिद्धि, बुद्ध, कन्थडि, कोरण्टक, सुरानन्द, सिद्धिपाद व चर्पटि ।

 

कानेरी पूज्यपादश्च नित्यनाथो निरञ्जन: ।

कपाली बिन्दुनाथश्च काकचण्डीश्वराह्वय: ।। 7 ।।

 

भावार्थ :- कानेरी, पूज्यपाद, नित्यनाथ, निरञ्जन, कपाली, बिन्दुनाथ व काकचण्डीश्वर नाम के ।

 

अल्लाम: प्रभुदेवश्च घोड़ाचोली च टिण्टिणि: ।

भानुकी नारदेवश्च खण्ड: कापालिकस्तथा ।। 8 ।।

 

भावार्थ :- अल्लाम, प्रभुदेव, घोड़ाचोली, व टिण्टिणि, भानुकी, नारदेव, खण्ड तथा कापालिक ।

 

इत्यादयो महासिद्धा: हठयोगप्रभावत: ।

खण्डयित्वा कालदण्डं ब्रह्माण्डे विचरन्ति ते ।। 9 ।।

 

भावार्थ :- इत्यादि ( ऊपर वर्णित ) महासिद्ध योगी हठयोग विद्या के प्रभाव से मृत्यु रूपी कालचक्र के भय को नष्ट करके मुक्त रूप से ब्रह्माण्ड में घूम रहे हैं । अर्थात ऊपर वर्णित सभी योगियों ने हठयोग साधना से मृत्यु पर विजय प्राप्त करके अपने आप को जीवन- मरण के बन्धन से मुक्त कर चुके हैं । इसलिए वह इस पूरे ब्रह्माण्ड में मुक्त रूप से कही भी घूमते रहते हैं ।

 

अशेषतापतप्तानां समाश्रयमठो हठ: ।

अशेषयोगयुक्तानामाधारकमठो हठ: ।। 10 ।।

 

भावार्थ :- जो व्यक्ति दुखों से अनन्त रूप से दुःखी हैं । उनके लिए यह हठयोग विद्या सुख रूपी आश्रय अर्थात घर की तरह है और जो योग साधक अनेक प्रकार की योग साधनाओं में लगे हुए हैं । उनके लिए यह हठयोग साधना आधारभूत कछुए के समान है । जिस प्रकार समुद्र मन्थन के दौरान कछुए को आधार बनाया गया था । ठीक उसी प्रकार यह हठयोग साधना भी अन्य सभी साधनाओं का आधार है ।

 

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  1. आपके सान्निध्य मे होना हमारे लिए सौभाग्य कि बात है गुरु जी।

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