प्रनष्टश्वासनि:श्वास: प्रध्वस्तविषयग्रह: । निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जयति योगिनाम् ।। 31 ।।   भावार्थ :- जिस साधक के प्राणों की गति समाप्त हो गई है अर्थात् जिसने प्राणायाम द्वारा अपने श्वास- प्रश्वास को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया है । जिस साधक की इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों का पूर्ण रूप से त्याग हो चुका है

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Hatha Pradipika Ch. 4 [31-34]

शाम्भवी मुद्रा वर्णन   वेदशास्त्रपुराणानि सामान्यगणिका इव । एकैक शाम्भवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ।। 35 ।।   भावार्थ :- वेद, शास्त्र और पुराण आदि ग्रन्थ सामान्य व आसानी से प्राप्त होने वाले हैं । लेकिन शाम्भवी मुद्रा ही एकमात्र कुलवधू ( अच्छे परिवार की बहू ) के समान गुप्त होती है ।   विशेष :-

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Hatha Pradipika Ch. 4 [35-42]

खेचरी मुद्रा वर्णन   सव्यदक्षिणनाडिस्थो मध्ये चरति मारुत: । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन् स्थाने न संशय: ।। 43 ।।   भावार्थ :- चन्द्र ( बायीं नासिका ) व सूर्य ( दायीं नासिका ) में चलने वाली प्राणवायु जब  बीच में अर्थात् सुषुम्ना नाड़ी में चलने लगती है । तब वह खेचरी मुद्रा की अवस्था होती

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Hatha Pradipika Ch. 4 [43-50]

बाह्यावायुर्यथा लीनस्तथा मध्यो न संशय: । स्वस्थाने स्थिरतामेति पवनो मनसा सह ।। 51 ।।   भावार्थ :- जिस प्रकार बाहर से लिया जाने वाला प्राणवायु स्थिर हो जाता है । उसी प्रकार मध्ये अर्थात् शरीर के अन्दर स्थित प्राणवायु भी स्थिर हो जाता है । तब अपने स्थान पर स्थित प्राणवायु मन के साथ मिलकर

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Hatha Pradipika Ch. 4 [51-64]

नादानुसन्धान वर्णन   अशक्यतत्त्वबोधानां मूढानामपि सम्मतम् । प्रोक्तं गोरक्षनाथेन नादोपासनमुच्यते ।। 65 ।।   भावार्थ :- जिन निम्न कोटि के योग साधकों को उस परम तत्त्व का ज्ञान नहीं हो पाता है । उन सभी के लिए गुरु गोरक्षनाथ द्वारा स्वीकृत ( मानी गई ) नादयोग उपासना की विधि का वर्णन किया गया है ।

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Hatha Pradipika Ch. 4 [65-77]

अस्तु वा मास्तु वा मुक्तिरत्रै वाखण्डितं सुखम् । लयोद् भवमिदं सौख्यं राजयोगादवाप्यते ।। 78 ।।   भावार्थ :- साधक को मोक्ष की प्राप्ति हो या न हो लेकिन राजयोग समाधि के परिणाम स्वरूप उसके चित्त में लय के उत्पन्न होने से उसे बिना खण्डित हुए ( निरन्तर मिलने वाले ) आनन्द की प्राप्ति होती है

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Hatha Pradipika Ch. 4 [78-86]

महति श्रूयमाणेऽपि मेघभेर्यादिके ध्वनौ । तत्र सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नादमेव परा मृशेत् ।। 87 ।।   भावार्थ :-  साधक को बादल के गरजने व भेरी जैसे तीव्र ध्वनि वाले नाद सुनाई देने पर भी उसे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म ध्वनियों को ही सुनने की कोशिश करनी चाहिए ।     घनमृत्युज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममृत्युज्य वा घने

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Hatha Pradipika Ch. 4 [87-93]