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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [51-64]

अध्याय 4: समाधि

मूल श्लोक · 4.51

बाह्यावायुर्यथा लीनस्तथा मध्यो न संशय: । स्वस्थाने स्थिरतामेति पवनो मनसा सह ।। 51 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार बाहर से लिया जाने वाला प्राणवायु स्थिर हो जाता है । उसी प्रकार मध्ये अर्थात् शरीर के अन्दर स्थित प्राणवायु भी स्थिर हो जाता है । तब अपने स्थान पर स्थित प्राणवायु मन के साथ मिलकर स्थिर हो जाती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है ।

मूल श्लोक · 4.52

एवमभ्यसमानस्य वायुमार्गे दिवानिशम् । अभ्यासाज्जीर्यते वायुर्मनस्तत्रैव लीयते ।। 52 ।।

भावार्थ

ऊपर वर्णित विधि के अनुसार प्राणवायु का दिन - रात अभ्यास करने से साधक प्राणवायु को जीत लेता है । जिससे प्राण गतिविहीन अथवा स्थिर हो जाता है । इस अवस्था में प्राण के साथ मन भी लीन ( स्थिर ) हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.53

अमृतै: प्लावयेद्देहमापादतलमस्तकम् । सिद्धयत्येव महाकायो महाबलपराक्रम् ।। 53 ।।

भावार्थ

ऊपर वर्णित साधना साधक को पैर से लेकर सिर तक सोमरस रूपी अमृत से परिपूर्ण ( भर ) कर देती है । जिससे साधक का शरीर विशाल ( बड़ा ) व अत्यन्त बल व पराक्रम से युक्त हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.54

शक्तिमध्ये मन: कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् । मनसा मन आलोक्य धारयेत् परमं पदम् ।। 54 ।।

भावार्थ

पहले साधक अपने मन को कुण्डलिनी शक्ति में स्थिर करे ( लगाए ) और फिर कुण्डलिनी शक्ति को मन में स्थिर करे । इस प्रकार योगी अपने मन को अपने ही मन में स्थिर करता हुआ उस परमपद अर्थात् सर्वोच्य पद ( समाधि ) को प्राप्त कर लेता है ।

मूल श्लोक · 4.55

खमध्ये कुरुचात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु । सर्वं च खमयं कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ।। 55 ।।

भावार्थ

मैं आकाश में और आकाश मुझमें स्थित है । इस प्रकार के भाव का ही विचार साधक को करना चाहिए । साथ ही सभी को ब्रह्म का अंश मानकर केवल उसी का चिन्तन अथवा उपासना करनी चाहिए । अन्य किसी की नहीं ।

मूल श्लोक · 4.56

अन्त: शून्यो: बहि: शून्य: कुम्भ इवाम्बरे । अतः पूर्णो बहि: पूर्ण: पूर्ण: कुम्भ इवार्णवे ।। 56 ।।

मूल श्लोक · 4.57

बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् । सर्वचिन्तां परित्यज्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ।। 57 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार खाली घड़े के बाहर और अन्दर का हिस्सा खाली रहता है अर्थात् वह शून्य स्थान कहलाता है । जिसे हम आकाश की संज्ञा देते हैं । ठीक इसी प्रकार पानी में डूबा हुआ घड़ा जिस प्रकार अन्दर व बाहर दोनों प्रकार से ही पानी से युक्त होता है अर्थात् उस घड़े के अन्दर भी जल होता है और उसके बाहर भी जल होता है । अतः जिस तरह घड़ा अन्दर व बाहर दोनों ही प्रकार से पूर्ण होता है ठीक उसी प्रकार योगी को भी साधना काल में सभी बाह्य ( बाहरी ) व आन्तरिक ( अन्दर ) विचारों का पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए । इस प्रकार योगी सभी बाहरी व भीतरी विचारों से पूरी तरह से शून्य होकर साधना करे ।

मूल श्लोक · 4.58

सङ्कल्पमात्रकलनैव जगत् समग्रम् सङ्कल्पमात्रकलनैव मनोविलास: । सङ्कल्पमात्रमतिमुत्सृज निर्विकल्पमाश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम् ।। 58 ।।

भावार्थ

हे राम! यह सम्पूर्ण जगत ( संसार )  हमारे मन की कल्पना मात्र ही है और इस जगत ( संसार ) की जितनी भी काल्पनिक रचनाएं हैं वह भी केवल हमारे मन की ही उपज ( देन ) है । अतः साधक को अपने मन द्वारा उपजी इस कल्पना के आश्रय को छोड़कर शान्ति को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए ।

मूल श्लोक · 4.59

कर्पूरमनले यद्वत् सैन्धवं सलिले यथा । तथा सन्धीयमानं च मनस्तत्त्वे विलीयते ।। 59 ।।

भावार्थ

जिस तरह अग्नि में डालने से कपूर अपना स्वरूप खोकर अग्नि के अन्दर विलीन ( लीन ) हो जाता है । तथा पानी में मिलाने पर जिस प्रकार नमक अपने स्वरूप को खोकर पानी में विलीन हो जाता है । ठीक इसी प्रकार मन को ब्रह्म तत्त्व में लगाने से वह मन भी अपना स्वरूप खोकर ब्रह्म में ही विलीन हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.60

ज्ञेयं सर्वं प्रतीतं च ज्ञानं च मन उच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्य: पन्था द्वितीयक: ।। 60 ।।

भावार्थ

जो भी पदार्थ जाने जाते हैं वह सभी ज्ञान के विषय हैं और मन भी ज्ञान का ही विषय है । इस तरह ज्ञान व ज्ञान को जानने वाले अर्थात् मन दोनों को ही विलीन करने से ही उस लय का मार्ग प्रशस्त ( मिलता ) होता है । इसके अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं है ।

मूल श्लोक · 4.61

मनोदृश्यमिदं सर्वं यत् किञ्चित् सचराचरम् । मनसो ह्युन्मनीभावाद् द्वैतं नैवोपलभ्यते ।। 61 ।।

भावार्थ

यह सभी चर व अचर दिखाई देने वाला सम्पूर्ण जगत हमारे मन का ही विषय है अर्थात् यह सब मन के द्वारा ही सम्भव हो पाता है । जैसे ही हमारा मन उन्मनी भाव ( समाधि ) को प्राप्त कर लेता है । वैसे ही द्वैत भाव ( दो प्रकार का विचार ) भी समाप्त हो जाता है ।

मूल श्लोक · 4.62

ज्ञेयवस्तुपरित्यागाद्विलयं याति मानसम् । मनसो विलये जाते कैवलयमवशिष्यते ।। 62 ।।

भावार्थ

जो भी ज्ञेय अर्थात् ज्ञान या जानकारी करवाने वाले पदार्थों का त्याग करने से मन भी ब्रह्म में लीन हो जाता है । इस तरह मन के ब्रह्म में लीन होने से साधक को कैवल्य ( समाधि ) की प्राप्ति हो जाती है ।

मूल श्लोक · 4.63

एवं नानाविधोपाया: सम्यक् स्वानुभवान्विता: । समाधि मार्गा: कथिता: पूर्वाचार्यैर्महात्मभि: ।। 63 ।।

भावार्थ

इस प्रकार पहले उत्पन्न हुये महान योग आचार्यों ने अपनी योग साधना के समय के अनुभवों से समाधि की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की योग विधियों का उपदेश दिया है ।

मूल श्लोक · 4.64

सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रजन्मने । मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ।। 64 ।।

भावार्थ

हे सुषुम्ना, कुण्डलिनी, चन्द्रमा से उत्पन्न अमृत, मनोन्मनी अवस्था ( समाधि ) व चित्त स्वरूप महाशक्ति आप सबको प्रणाम है ।

विशेष

ऊपर वर्णित सभी शब्द समाधि को ही परिभाषित करते हैं । अतः सूत्रकार इनको विशेष महत्त्व देते हुए इन सबको प्रणाम करता है ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Neelam

    ??

  2. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।