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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [65-77]

अध्याय 4: समाधि

नादानुसन्धान वर्णन

मूल श्लोक · 4.65

अशक्यतत्त्वबोधानां मूढानामपि सम्मतम् । प्रोक्तं गोरक्षनाथेन नादोपासनमुच्यते ।। 65 ।।

भावार्थ

जिन निम्न कोटि के योग साधकों को उस परम तत्त्व का ज्ञान नहीं हो पाता है । उन सभी के लिए गुरु गोरक्षनाथ द्वारा स्वीकृत ( मानी गई ) नादयोग उपासना की विधि का वर्णन किया गया है ।

मूल श्लोक · 4.66

श्री आदिनाथेन सपादकोटिलयप्रकारा: कथिता जयन्ति । नादानुसन्धानकमेकमेव मन्यामहे मुख्यतमं लयानाम् ।। 66 ।।

भावार्थ

श्री आदिनाथ शिव ( भगवान शिव ) के द्वारा नादयोग साधना के सवा करोड़ प्रकार बताए हैं अर्थात् भगवान शिव ने नादयोग साधना की सवा करोड़ विधियों का वर्णन किया है । उनमें से मैं नादयोग को सबसे महत्त्वपूर्ण मानता हूँ ।

मूल श्लोक · 4.67

मुक्तासने स्थितो योगी मुद्रां सन्धाय शाम्भवीम् । शृणुयाद्देक्षिणे कर्णे नादमन्तस्थमेकधी: ।। 67 ।।

भावार्थ

इसके लिए सबसे पहले साधक मुक्तासन की स्थिति में बैठकर शाम्भवी मुद्रा को लगाए । इसके बाद पूरी तरह से एकाग्रचित्त होकर अपने दायें कान से शरीर के अन्दर से आने वाली आवाज को सुनने की कोशिश करे ।

मूल श्लोक · 4.68

श्रवणपुटनयनयुगल घ्राणमुखानां निरोधनं कार्यम् । शुद्धसुषुम्नासरणौ स्फुटममल: श्रूयते नाद: ।। 68 ।।

भावार्थ

जब साधक अपने दोनों कान, दोनों आँख, नासिका के दोनों छिद्रों और मुहँ को बन्द कर लेता है । तब उसे पूरी तरह से शुद्ध सुषुम्ना मार्ग से पूरी तरह से स्पष्ट व पवित्र नाद सुनाई पड़ता है ।

नादयोग की चार अवस्थाएँ

मूल श्लोक · 4.69

आरम्भश्च घटश्चैव तथा परिचयोऽपि च । निष्पत्ति: सर्वयोगेषु स्यादवस्थाचतुष्टयम् ।। 69 ।।

भावार्थ

सभी प्रकार की योग साधना पद्धतियों में मुख्य रूप से चार प्रकार की अवस्थाएँ पाई जाती हैं । जिन्हें क्रमशः आरम्भ अवस्था, घट अवस्था, परिचय अवस्था व निष्पत्ति अवस्था कहा जाता है ।

विशेष

इस श्लोक में नादयोग की सभी अवस्थाओं को क्रमानुसार दर्शाया गया है । परीक्षा की दृष्टि से भी यह श्लोक अति महत्त्वपूर्ण है । बहुत बार नाद की पहली से लेकर अन्तिम अवस्था तक इनके सही क्रम को पूछा जाता है । अतः सभी विद्यार्थी इनके इस क्रम को याद करलें ।

आरम्भ अवस्था के लक्षण

मूल श्लोक · 4.70

ब्रह्मग्रन्थेर्भवेद् भेदादानन्द: शून्यसम्भव: । विचित्र: क्वणको देहेऽनाहत: श्रूयते ध्वनि: ।। 70 ।।

मूल श्लोक · 4.71

दिव्यदेहसश्च तेजस्वी दिव्यगन्धस्त्वरोगवान् । सम्पूर्णहृदय: शून्य आरम्भे योगवान् भवेत् ।। 71 ।।

भावार्थ

नादयोग की पहली अवस्था में साधक की ब्रह्मग्रन्थि का भेदन हो जाता है । जिससे साधक विचार शून्य अर्थात् विचारों से रहित हो जाता है । विचार शून्यता के परिणाम स्वरूप उसे दिव्य आनन्द की अनुभूति ( अहसास ) होती है । शरीर में असाधारण प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं । साधक का शरीर दिव्य गन्ध व दिव्य तेज से युक्त हो जाता है । वह सभी प्रकार के रोगों से मुक्त हो जाता है साथ ही उसका चित्त प्रसन्न होकर शून्य भाव को प्राप्त हो जाता है ।

घटावस्था के लक्षण

मूल श्लोक · 4.72

द्वितीयायां घटीकृत्य वायुर्भवति मध्यग: । दृढासनो भवेद्योगी ज्ञानी देवसमस्ततथा ।। 72 ।।

मूल श्लोक · 4.73

विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात् परमानन्दसूचक: । अतिशून्ये विमर्दश्च भेरीशब्दस्तदा भवेत् ।। 73 ।।

भावार्थ

दूसरी अवस्था अर्थात् नाद की घटवस्था में प्राणवायु शरीर को घड़ा बनाकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर जाती है । जिससे साधक का आसन मजबूत हो जाता है और योगी के अन्दर देवताओं के समान ज्ञान हो जाता है । जिसके बाद उस साधक की विष्णु ग्रन्थि का भेदन ( खुल जाना ) हो जाता है । तब साधक शून्यभाव होकर परम आनन्द को देने वाले विमर्द और भेरी ( वाद्ययंत्र ) नामक शब्दों को सुनता है

परिचय अवस्था के लक्षण

मूल श्लोक · 4.74

तृतीयायां तु विज्ञेयो विहायो मर्दलध्वनि: । महाशून्यं तदा याति सर्वसिद्धि समाश्रयम् ।। 74 ।।

मूल श्लोक · 4.75

चित्तानन्दं तदा जित्वा सहजानन्दसम्भव: । दोषदुःखजराव्याधिक्षुधानिद्राविवर्जित: ।। 75 ।।

भावार्थ

नादयोग की इस तीसरी अवस्था में साधक को हृदय आकाश में मर्दल नामक वाद्ययंत्र की ध्वनि सुनाई देती है । प्राण सभी सिद्धियों को प्रदान करवाने वाले उस आकाश तत्त्व में पहुँच कर वहाँ स्थित विशुद्धि चक्र का भेदन करता है । जिसके परिणाम स्वरूप साधक को सहजानन्द की प्राप्ति होती है । इसके अलावा योगी सभी दोषों ( वात, पित्त, कफ ), सभी प्रकार के दुःखों, बुढ़ापा, सभी रोगों, भूख व निद्रा से मुक्त हो जाता है ।

निष्पत्ति अवस्था के लक्षण

मूल श्लोक · 4.76

रुद्रग्रन्थिं यदा भित्वा शर्वपीठगतोऽनिल: । निष्पत्तौ वैणव: शब्द: क्वणद्वीणाक्वणो भवेत् ।। 76 ।।

मूल श्लोक · 4.77

एकीभूतं तदा चित्तं राजयोगाभिधानकम् । सृष्टिसंहारकर्तासौ योगीश्वरसमो भवेत् ।। 77 ।।

भावार्थ

नादयोग की चौथी अवस्था अर्थात् निष्पत्ति में साधक का प्राण रुद्रग्रन्थि का भेदन करके आज्ञा चक्र में स्थित हो जाता है । जिसके परिणाम स्वरूप साधक को वीणा नामक अत्यन्त मनमोहक वाद्ययन्त्र की ध्वनि सुनाई देती है । साथ ही चित्त एकाग्र अवस्था को प्राप्त हो जाता है । जिसे राजयोग नामक समाधि कहा जाता है । इस अवस्था में साधक में ईश्वर के समान सृष्टि को बनाने व नष्ट करने का सामर्थ्य आ जाता है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha Dahiya

    Thanks sir

  2. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Very Beautifully explained all the stages which even made it easy for us to learn and remember. Thank you. ??

  3. Neelam

    Great , awesome thank you sir for this precious information

  4. Rita

    Thanks sir

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. vaidyadeshbandhu@gmail.com

    Very good