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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [43-50]

अध्याय 4: समाधि

खेचरी मुद्रा वर्णन

मूल श्लोक · 4.43

सव्यदक्षिणनाडिस्थो मध्ये चरति मारुत: । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन् स्थाने न संशय: ।। 43 ।।

भावार्थ

चन्द्र ( बायीं नासिका ) व सूर्य ( दायीं नासिका ) में चलने वाली प्राणवायु जब  बीच में अर्थात् सुषुम्ना नाड़ी में चलने लगती है । तब वह खेचरी मुद्रा की अवस्था होती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है ।

मूल श्लोक · 4.44

इडापिङ्गलयोर्मध्ये शून्यं चैवानिलं ग्रसेत् । तिष्ठते खेचरी मुद्रा तत्र सत्यं पुनः पुनः ।। 44 ।।

भावार्थ

इडा व पिङ्गला नाड़ियों के बीच में स्थित सुषुम्ना नाड़ी में जब प्राणवायु का ग्रहण होता है तब वहाँ पर खेचरी मुद्रा स्थित होती है । यह बात पूर्ण रूप से सत्य है ।

मूल श्लोक · 4.45

सूर्याचन्द्रमसोर्मध्ये निरालम्बान्तरे पुनः । संस्थिता व्योमचक्रे सा या मुद्रा नाम खेचरी ।। 45 ।।

भावार्थ

एक बार फिर जो इडा व पिङ्गला नाड़ियों के बीच में अर्थात् सुषुम्ना नाड़ी में बिना किसी की सहायता के जो व्योमचक्र ( आकाश में ) स्थित है । वह खेचरी मुद्रा है ।

मूल श्लोक · 4.46

सोमाद्यत्रोदिता धारा साक्षात् सा शिववल्लभा । पूरयेदतुलां दिव्यां सुषुम्नां पश्चिमे मुखे ।। 46 ।।

भावार्थ

सोममण्डल अर्थात् चन्द्र नाड़ी से बहने वाली धारा साक्षात भगवान शिव की प्रिय है । उस सोमधारा को पीछे के मार्ग से अर्थात् मेरुदण्ड के माध्यम से सुषुम्ना नाड़ी में भर देना चाहिए ।

मूल श्लोक · 4.47

पुरस्ताच्चैव पूर्येत निश्चिता खेचरी भवेत् । अभ्यस्ता खेचरी मुद्राप्युन्मनी सम्प्रजायते ।। 47 ।।

भावार्थ

इस प्रकार उस सोमधारा को सुषुम्ना नाड़ी में भर देने पर निश्चित रूप से खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है । इस प्रकार इस खेचरी मुद्रा के अभ्यास से उन्मनी अर्थात् समाधि की सिद्धि होती है ।

मूल श्लोक · 4.48

भ्रुवोर्मध्ये शिवस्थानं मनस्तत्र विलीयते । ज्ञातव्यं तत्पदं तुर्यं तत्र कालो न विद्यते ।। 48 ।।

भावार्थ

दोनों भौहों के बीच में जो स्थान होता है उसे भगवान शिव का स्थान कहा गया है । जिसे तन्त्र की भाषा में आज्ञा चक्र कहते हैं । साधक को अपना मन वहाँ पर विलीन अर्थात् स्थिर कर देना चाहिए । वहाँ पर काल का बोध ( मृत्यु ) अथवा ज्ञान नहीं होता । जिससे साधक मृत्यु को जीत कर समाधि की प्राप्ति कर लेता है ।

मूल श्लोक · 4.49

अभ्यसेत् खेचरीं तावद्यात् स्याद्योगनिद्रित: । सम्प्राप्तयोगनिद्रस्य कालो नास्ति कदाचन ।। 49 ।।

भावार्थ

साधक को इस खेचरी मुद्रा का अभ्यास तब तक करना चाहिए जब तक कि वह योगनिद्रा ( समाधि ) को  प्राप्त नहीं कर लेता । जैसे ही साधक को योगनिद्रा की प्राप्ति ( समाधि ) हो जाती है । वैसे ही उसे काल ( मृत्यु ) का कोई डर नहीं रहता ।

मूल श्लोक · 4.50

निरालम्बं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् । स बाह्याभ्यन्तरे व्योम्नि घटवत्तिष्ठति ध्रुवम् ।। 50 ।।

भावार्थ

जब साधक अपने मन को सभी प्रकार के विचारों से मुक्त कर देता है और साथ ही मन के सभी प्रकार के संकल्प- विकल्पों को रोक देता है । तब साधक बाहर और भीतर से ठीक उसी प्रकार से स्थिर हो जाता है । जैसे कि घड़ा एक जगह पर स्थिर रहता है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Neelam

    Good one

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    शांभवी एवं खेचरी मुद्रा की बहुत ही उत्तम व्याख्या की है आपने।

    अस्तु आपको हृदय से आभार।

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. सुरेश

    खेचरिमुद्दरा का हठयोग प्रदीपिका अनुसार शब्द सह समजती अवम वर्णन। ????????????